मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

आवाज

हर तरफ से कोई जवाब नहीं,
तुझे कहाँ कहाँ आवाज दे.

क्या तु इन सब वाकियों से नाराज हैं,
क्या तुझे इन सभी लोगों से खफा हैं,
लेकिन तु तो कहता हैं के ये तुने ही बनायें हैं,
फिर गलती कहाँ हो रही हैं, उनको कोई सवाब दे.

सब कहते तेरे बन्दे हैं,
फिर भी सबके हाथ गंदे हैं,
क्या कोई तुझसे डरता नहीं,
क्या कोई तुझपे मरता नहीं, इसका कोई हिसाब दे.

सब अपने आप को तुझसे बड़ा मानते हैं ,
जब कोई आति हैं आफत तभी तेरा होना मानते हैं,
सब जानते हुए भी अनजान हैं,
फिर भी तुझसे खुश देखना चाहते हैं, उनको कोई नकाब दे.

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

मजे करो

खुश रहो या नाखुश
मजे करो भई मजे करो.

कुछ आये न आये,
दिखाओ ऐसे के उस्ताद हो,
सबपर झाडो रोब,
मजे करो भई मजे करो.

बिन बुलाये मेहमान होकर,
सबसे आगे आओ हंसकर,
लड़ते झगड़ते इनाम पाओ,
मजे करो भई मजे करो.

लोगोंने कितनी भी दी गलियाँ,
दिखाओ ऐसे के बजाई तालियाँ,
फिर भी प्यार की गुजारिश करो,
मजे करो भाई मजे करो.

बेशर्म होकर मांगो भिक,
गिड़गिडाकर पैर पकड़ो ठिक,
बेचकर देशको रहो नेक
मजे करो भई मजे करो.

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

भुक

ठोकर आदमी को चलना सिखाती है ,
भुक आदमी को जीना सिखाती है.

इसके लिए लोग कहाँ से कहाँ जाते हैं ,
कई रह्गुजरों को दरबदर कराती है.

रिश्ते भी टिक नहीं पाती इसके आगे,
भाई-भाई को ये आपस में लड़ती है.

जात पात इसके सामने कुछ भी नहीं,
आमिरों को भी ये सजदा करवाती है.

कई लोग खुदको बेचते हैं इसके लिए
माओं को भी ये बेबस करवाती है.

इसके आगे सब लाचार हैं,
भुक होशो हवास सब भुलाती हैं.

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

इश्क

जीने के अंदाज़ बदल गए हैं अभीसे,
जबसे किया हैं मैंने इश्क तुझीसे.

कोई शउर, कोई सुकून भूला बैठा हूँ,
दिन रात एक सी हैं, हर पल भुला हूँ.

अब तेरी साँसों का सहारा हैं,
अब तेरी जुल्फों का आसरा हैं.

सुबह कब हुयी, शाम कब ढली किसको पता,
भूक कैसी हैं, प्यास कैसी किसको पता.

लहरों का उछलना मुझको भाता नहीं,
बादलों का बरसना रास आता नहीं.

बिजली भी अब नमसी गयी हैं तेरे आगे,
गहरी सांस भी थम सी गयी हैं तेरे आगे.

ये इश्क हैं या खुदा की देन,
अब न मैं रहा न कोई चैन.

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

अजनबी

आदमियों की भीड़ में खुद को अकेला पाता हूँ,
कई चेहरों से मिलकर भी अजनबी सा दिखता हूँ.

पास होकर भी सभी कहाँ अपने होते हैं,
मीठी नींद में देखे हुए सपने कहाँ सच्चे होते हैं.

मुस्कुराते हुए चला जाता हूँ.
शोलों को सीने में दफनाये जाता हूँ.

मायूसी का आलम यूं है
ख़ामोशी का डर यूं हैं.

आज भी तन्हाई अच्छी लगती हैं
दर्द होकर भी सच्ची लगती हैं.

मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

हमार सैय्याँ

सैय्याँ हमार घर आवत हैं,
खुशियों की बहार आवत हैं.

सैय्याँ हमार बचपन,
रुठत हैं तो मनावत भी हैं,
दर्द होत तो रोवत भी हैं,
माँ बाप से बढ़कर प्यार करवत हैं.

सैयाँ हमार बगियन,
झूमता पेड़, नाचता आँगन,
शर्माता जैसे टपोरा बैंगन,
जीवन में हमार हरियाली छावत हैं.

सैय्याँ हमार पालनहार,
जीवन का असली गहना
पलमे भाई पलमे बहना,
मोती भी वोही सोना भी वोही लागत हैं.

उपरवाले से यही बिनती हमार,
दुबारा जनम दे तो यहीं हरबार,
सैय्याँ बिन अब जीना नहीं,
सैय्याँ बिन दुनिया परायी भावत हैं.

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

राहें

गुमनाम राहें सिखाती हैं हमें,
अकेलेपन में दिया नजर आती हैं हमें.

हजारों रह्गुजरों से इतराती नहीं ,
सुनसान समय में निराश होती नहीं,
सही मायने में जिन्दगी का अंदाज़ सिखाती हैं हमें.

ऊपर, निचे अनगिनत हैं हाल भी,
भले ही कई मोड़ आते हैं फिर भी,
सीधा चलना सिखाती हैं हमें.

भागती जिंदगी का साथ देती हैं.
लगी ठोकर तो उठना सिखाती हैं,
हारे हुए पैरों में जान फूंक देती हैं हमें.

गुमनाम राहें सिखाती हैं हमें,
अकेलेपन में दिया नजर आती हैं हमें.