रविवार, 29 अप्रैल 2012

हाथों की ठंडक

तेरे हाथों की लकिरें बताना भुल गयी 
मेरे साथ तेरा नाता पुराना हैं 
कुछ बाते कहने की नहीं 
समझने की भी होती हैं 

सरगर्मी की वो धुप 
और तेरे माथे का पसीना 
मुझे याद  दिलाता रहा 
फिसलते हुए क़दमों का बोझ.

पिछले साल की गर्मी मुझे 
बहुत कुछ ठंडक दिला गयी 
शायद तुम मेरे साथ थी 
और हाथों को  जकड के रक्खा था.

आज  सूरज की किरने
चुभते हुए काँटों की तरह लगती हैं 
शायद वो भी जानती हैं 
बहुत कुछ बदला हुआ हैं 

 आज भी याद करता हूँ 
जिन्दगी के वो हसीं पल 
डूबता हुआ सूरज भी 
माथे का सिंदूर बनकर बैठा है.


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