मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

फेसबुक के आठ साल

करोडो लोग जिस नेटवर्क से जुड़े हैं वो फेसबुक आज आठ साल का होने जा रहा हैं.  ८४ करोड लोग इससे जुड़े हैं. फेसबुक के प्रमुख मार्क जुकेरबर्ग जिन्होंने इसकी शुरुआत की आज सबके चहेता बन गए हैं.  एडुँर्दो  सवेरिन, दुस्तीं मोस्कोवित्ज़,  ख्रिस हुगेस इन तिनोंके साथ उन्होंने एक ऐसा माध्यम सबके सामने लाया हैं, जो आज के विशेषतः युवाओं में खासा लोकप्रिय बना हुआ हैं.
ये बात कुछ और हैं के इसपर कुछ प्रतिबन्ध लगाये जाएँ ऐसा भारत सर्कार का कहना हैं. लेकिन फिर भी उसका कोई सानी नहीं हैं. गूगल प्लस ने अपनी वेब साईट शुरू की हैं. फिर भी उसपर कुछ असर नहीं पड़ा हैं. फेसबुक ने कई रिकोर्ड  कायम किये हैं. आज दुनिया का कोई ऐसा गाँव नहीं जहाँ पे कम से फेसबुक को नहीं जनता हो. इससे दुनिया के कई लोग जुड़े हैं. ये दुनिया अब गोल नहीं लगती. ये दुनिया अब फ्लैट हो गयी हैं. सब एक ही कतार में खड़े हैं ऐसा लग रहा हैं.
भारत में फेसबुक के तक़रीबन १३ करोड लोग यूज़र्स हैं. आज के हर युवोंका ये लोकप्रिय रहा हैं. पिछले दिनों एक सर्वे  हुआ जिसमे धीरे धीरे लोग फेसबुक से उकता गए हैं ऐसा कहा गया था . आखिर ये एक वेब साईट हैं कोई जीने के तरीका नहीं. हम इससे ज्यादा कुछ उम्मीद नहीं रखनी चाहिए.  जो लोग ऐसा करते हैं वो जरुर इससे बाहर जा सकते हैं.
यक़ीनन फेसबुक ने लोगों के जीने के अंदाज बदल दिए हैं. आज कोई भी कहीं भी जाये इससे जुड़ा रहना चाहता हैं. फेसबुक के इस आठ साल पुरे होने के अवसर पर इसे बधाई देना चाहिए और लोगों को करीब लाने के लिए धन्यवाद देना चाहिए.

फेसबुक के आठ साल

रविवार, 5 फ़रवरी 2012

युवी और हम

दो दिन पहले कैंसर डे मनाया गया और आज भारत के प्रतिभाशाली खब्बू खिलाडी युवराज सिंह को कैंसर होने की खबर मिली. सारा देश इस खबर से सकते में आया हैं. हालाकि ये डरनेवाली बात नहीं ऐसा  डोक्टोरोने कहा हैं लेकिन इससे ये जरुर जाहिर होता हैं के भारत ये पसंदीदा खिलाडी अब अगले कुछ दिन तक नहीं खेलने वाला.
कितने  अजीब होते  हैं ये  जिन्दगी के रिश्ते. कुछ दिन पहले युवी अच्छा नहीं खेल रहे तो तो उन्हें बाहर  बिठाने की बात कही जा रही थी. ये वोही युवी हैं जिन्होंने एक ही ओवर में ६ छक्के लगाये हैं और भारत को जितवाया हैं.
आज उनकी ये बीमारी की खबर सुनकर सबको बहुत बुरा लगा हैं और कईयों ने उनके ठीक होने की दुआ भी की हैं.
हर बीमार आदमी की तरफ देखने का दृष्टिकोण अलग होता हैं. दुश्मन भी न क्यों हो सब लोग उसके अच्छे होने के बारे में प्रार्थनाएं करते हैं. उसकी खुशहाली की दुआ मांगते हैं. आखिर ऐसा क्यों होता हैं. आदमी ऐसा क्यों करता हैं. कभी कभी पता ही नहीं चलता की ये वोही लोग हैं जो उसी व्यक्ति को गलियां दे रहे थे. यही एक सच्चा प्यार हैं जो आदमी को आदमी से जोड़ता हैं. ये एक अनमोल धागा हैं जो अपनों को नजदीक लाता हैं. 
युवी एक उदाहरण हैं समाज का, उसके अच्छे बुरेपन का. संस्कृति का. आदमी के  उसके मन में  अलग अलग भावनाएं पनपने  लगती हैं. लोग अपने भावनाओंको समझ नहीं पाते. ये एक ऐसी परिभाषा हैं जिसे हम एक सूत्र में नहीं बांध सकते.
आज कई ऐसे लोग हैं जो कैंसर जैसे रोगों से पीड़ित हैं. युवी के इस बीमारी के बाद हम सभी ऐसे लोगों के प्रति अच्छी भावनाओंके साथ अच्छा व्यवहार करे. उनके प्रति संवेदनाएं जताएं. आओं हम सभी लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करने की शपथ लें और उन्हें हमेशा खुश रखने की कोशिश करें.
 युवी और हम 

सोमवार, 30 मई 2011

कुछ अलग

बहुत दिनों के बाद लगा के ब्लॉग पे कुछ तो लिखूं। आये दिन कुछ खास नहीं रहा है। आयपीएल खत्म हुआ और लोग भूल भी गए की कुछ हुआ था। बाकि क्रिकेट अब बोअर होता जा रहा है हर दिन मैच देखी नहीं जाती। जैसे हर रोज अच्छा खाना कुछ फीका सा लगता हैं उसी तरह। बारिश हो रही हैं लेकिन उसमे भी अलग सा मजा नहीं आ रहा। कुछ लोग जरुर कहेंगे की हमें हर चीज़ में नयापन ढूँढना चाहिए। भ्रष्टाचार से लोग उकता गए हैं। अन्ना हजारे के अनशन को भी लोग भूल गए हैं। आदमी की सोचने की शक्ति अब कम होते जा रही हैं। इसीलिए लोग बहुत कम समय तक सोचते हैं और भूल जाते हैं।
नया कुछ अच्छा पढने को भी नहीं मिल रहा। लोगोंको वही वही पढ़कर बोअर होने लगा हैं। लोगों को इसीलिए कुछ चटपटा चाहिए। कुछ अलग। खेती और किसान के बारे में पढने को लोगों को इंतना मजा नहीं आता। हाँ अगर प्याज और चीनी के दाम बढ़ गए तो लोग चिल्लाने लगते हैं। सब्जी, दाल और आटे के भाव बढ़ गए गए तो लोगों को लगता हैं किसान हमारी जेब पे डाका डाल रहे हैं। इसीलिए लोग किसान की आत्महत्या के बारे में भी पढना नहीं चाहते। ये भी दिन जायेंगे.

सोमवार, 14 मार्च 2011

दो व्यक्ति

कुछ लोग जिन्दगी में आते हैं और चले जाते हैं। लेकिन कुछ ऐसे होते हैं जो सही मायने में जिन्दगी को एक नया मोड़ देते हैं। उन्हें आगे बढ़ने में सहायता करते हैं। मैं आज दो लोगों की बात करूँगा एक हैं अतुल पेठे और दुसरी हैं अंजलि गुर्जर। पिछले दिनों नाशिक में एक वोर्क्शोप हुआ। जहाँ पे में काम करता हूँ उस लोकमत द्वारा। पहले ही दिन मुझे एक ऐसे शख्स मिले जो मुझसे भी उम्र में बड़े होकर चुस्तिले और फुर्तीले थे। बकाये तौर पे वो काफी नौजवान हैं। ऐसा शख्स मैंने पहले कभी नहीं देखा। इतना की आदमी की प्रतिभा इतनी ज्यादा हो सकती हैं मैंने पहली बार देखा। आपने आप में झाँकने को उन्हों ने सिखाया। मैं भी कई बार दंग रह गया की क्या मुझमे वाकई ऐसा कुछ हैं जिसके तरफ मैं अच्छे नजर से देख सकता हूँ। क्या क्या नहीं सिखाया उन्होंने। चित्रकला, संगीत, नृत्य, नाटक और भी बहुत कुछ। अपने मन के अन्दर की चौथी खिड़की खोलने को उन्होंने सिखाया।
इस भाग दौड़ भरी जिन्दगी से कुछ निज़ात पाने के लिए ये वर्क शॉप जरुरी था। लेकिन जिस प्रकार से अतुल पेठेजी ने हमें सिखाया वो किताब के बाहर भी एक जिन्दगी हैं। उसके तरफ किस नजर से देखे वो पढने जैसा था। हम पत्रकार के अलावा भी कुछ हैं एक इंसान उसीका अंदाज़ा उन्होंने दिखाया। मैं उनकी कला की क़द्र करता हूँ और उन्हें नमन करता हूँ।
एक और हस्ती से मैं मिला उनका नाम था अंजलि गुर्जर। वैसे उनकी मुलाकात एक बस में हुई। मैं रिच डैड एंड पुअर डैड किताब पढ़ रहा था। वो मेरे पास पास वाले सिट पे बैठी थी। कुछ देर बाद उन्होंने पुचा इस किताब में क्या हैं। उसके बाद उन्होंने जो उनके बारे में बताया वो अजब था। एक महिला जो नया सोचती हैं वो सुनके मैं दंग रह गया। क्या क्या नहीं किया उन्हों ने। ट्रेकिंग, राफ्टिंग सभी किया। उनकी और भी बड़ी इच्छा हैं। काश मैं उनकी तरह कुछ कर पाता। मुझे उन्होंने कुछ बताया, या सिखाया मैं जिन्दगी भर नहीं भूल पाऊंगा। बहुत ही उम्दा महिला और बहुत आशादायी महिला। उन्होंने बहुत सारे जगह पे जाके उसका अभ्यास किया हैं। और बार बार जाने की इच्छा भी हैं उनकी। मै काफी खुश हूँ उनसे मिलके और आशा करता हूँ के आगे भी मिलु और उनसे और ज्ञान प्राप्त करू। मैं उनको प्रणाम करता हूँ.

गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

गुजरे हुए पलों को कौन लौटा सकता है, आने वाले फिजाओं की रंगत कौन पहचाने, आओ दुआ करे उगते हुए सूरज से, भर दो झोली उन नंगे फकीरों की, आओ फिर से एक हो जाएँ, देश के लिए मिट जाएँ। नए साल की खुशियां मनाते समय उन सभी को याद करे। छोटा हो या बड़ा, आमिर हो या गरीब सबकी खुशियाँ आबाद रहे, दिल हमारा अजीम रहे। सभी को नया साल मुबारक।

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

दूर

बुझ गए उम्मीद के चराग
सपनों की लौ बुझ गयी
आशाओं के फूल कुम्हला गए
उसके दूर चले जाने से.

तमन्ना बड़ी देर से मचली थी
मिलने की आस यूँ ही निकली थी
बह गयी सारी यादें
आसुओंकी तूफानी बाढ़ से.

डूबती नैय्या जीवन की
संकट की घडी अमावस की
दूर गूंजती हुयी शहनाई
मलती है रक्त का अबीर.

सहमी हुए रातों में
थके हारे बोझल हाथों में
सन्नाटेपन की सरसराहट
नियतीने भी दिया धोखा.

जीवन अब समाप्त हो गया
यादों के मेले कबके खत्म हुए
अकेला रह गया है शायद नसीब
दोष दे तो देभी किसें.

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

जानवर

मै गर्दन झुकाए खड़ा हूँ
आदमी होने का इम्तेहान देते
किसी वहशी लुटेरे जानवर की तरह
अपने अन्दर की इंसान को मारकर.

बदशक्ल, बेसुरत अवस्था में
ना कोई पहचनता है मुझको
भेड़ियों की तरह मैं रौंदता हूँ
अपनी यादों की कुदरत को.

ना मेरा कोई रिश्ता है
ना मै किसीका रिश्तेदार
मै बस एक ही अस्त्र लिए खड़ा हूँ
तन्हाईयों की भीड़ में खड़े उस अनजान के लिए.

क्या कुसूर है उसका
क्या उसने सिर्फ मेरी यादों के
दीवारों को टटोला था
सिर्फ इसकी सजा उसे क्यों?

मै उस चिता की तरह
सिर्फ इतना ही जानता हूँ
मुझे सिर्फ जलाना है
आदमी के अन्दर के गुरुर को