ठोकर आदमी को चलना सिखाती है ,
भुक आदमी को जीना सिखाती है.
इसके लिए लोग कहाँ से कहाँ जाते हैं ,
कई रह्गुजरों को दरबदर कराती है.
रिश्ते भी टिक नहीं पाती इसके आगे,
भाई-भाई को ये आपस में लड़ती है.
जात पात इसके सामने कुछ भी नहीं,
आमिरों को भी ये सजदा करवाती है.
कई लोग खुदको बेचते हैं इसके लिए
माओं को भी ये बेबस करवाती है.
इसके आगे सब लाचार हैं,
भुक होशो हवास सब भुलाती हैं.
शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010
गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010
इश्क
जीने के अंदाज़ बदल गए हैं अभीसे,
जबसे किया हैं मैंने इश्क तुझीसे.
कोई शउर, कोई सुकून भूला बैठा हूँ,
दिन रात एक सी हैं, हर पल भुला हूँ.
अब तेरी साँसों का सहारा हैं,
अब तेरी जुल्फों का आसरा हैं.
सुबह कब हुयी, शाम कब ढली किसको पता,
भूक कैसी हैं, प्यास कैसी किसको पता.
लहरों का उछलना मुझको भाता नहीं,
बादलों का बरसना रास आता नहीं.
बिजली भी अब नमसी गयी हैं तेरे आगे,
गहरी सांस भी थम सी गयी हैं तेरे आगे.
ये इश्क हैं या खुदा की देन,
अब न मैं रहा न कोई चैन.
जबसे किया हैं मैंने इश्क तुझीसे.
कोई शउर, कोई सुकून भूला बैठा हूँ,
दिन रात एक सी हैं, हर पल भुला हूँ.
अब तेरी साँसों का सहारा हैं,
अब तेरी जुल्फों का आसरा हैं.
सुबह कब हुयी, शाम कब ढली किसको पता,
भूक कैसी हैं, प्यास कैसी किसको पता.
लहरों का उछलना मुझको भाता नहीं,
बादलों का बरसना रास आता नहीं.
बिजली भी अब नमसी गयी हैं तेरे आगे,
गहरी सांस भी थम सी गयी हैं तेरे आगे.
ये इश्क हैं या खुदा की देन,
अब न मैं रहा न कोई चैन.
बुधवार, 6 अक्टूबर 2010
अजनबी
आदमियों की भीड़ में खुद को अकेला पाता हूँ,
कई चेहरों से मिलकर भी अजनबी सा दिखता हूँ.
पास होकर भी सभी कहाँ अपने होते हैं,
मीठी नींद में देखे हुए सपने कहाँ सच्चे होते हैं.
मुस्कुराते हुए चला जाता हूँ.
शोलों को सीने में दफनाये जाता हूँ.
मायूसी का आलम यूं है
ख़ामोशी का डर यूं हैं.
आज भी तन्हाई अच्छी लगती हैं
दर्द होकर भी सच्ची लगती हैं.
कई चेहरों से मिलकर भी अजनबी सा दिखता हूँ.
पास होकर भी सभी कहाँ अपने होते हैं,
मीठी नींद में देखे हुए सपने कहाँ सच्चे होते हैं.
मुस्कुराते हुए चला जाता हूँ.
शोलों को सीने में दफनाये जाता हूँ.
मायूसी का आलम यूं है
ख़ामोशी का डर यूं हैं.
आज भी तन्हाई अच्छी लगती हैं
दर्द होकर भी सच्ची लगती हैं.
मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010
हमार सैय्याँ
सैय्याँ हमार घर आवत हैं,
खुशियों की बहार आवत हैं.
सैय्याँ हमार बचपन,
रुठत हैं तो मनावत भी हैं,
दर्द होत तो रोवत भी हैं,
माँ बाप से बढ़कर प्यार करवत हैं.
सैयाँ हमार बगियन,
झूमता पेड़, नाचता आँगन,
शर्माता जैसे टपोरा बैंगन,
जीवन में हमार हरियाली छावत हैं.
सैय्याँ हमार पालनहार,
जीवन का असली गहना
पलमे भाई पलमे बहना,
मोती भी वोही सोना भी वोही लागत हैं.
उपरवाले से यही बिनती हमार,
दुबारा जनम दे तो यहीं हरबार,
सैय्याँ बिन अब जीना नहीं,
सैय्याँ बिन दुनिया परायी भावत हैं.
खुशियों की बहार आवत हैं.
सैय्याँ हमार बचपन,
रुठत हैं तो मनावत भी हैं,
दर्द होत तो रोवत भी हैं,
माँ बाप से बढ़कर प्यार करवत हैं.
सैयाँ हमार बगियन,
झूमता पेड़, नाचता आँगन,
शर्माता जैसे टपोरा बैंगन,
जीवन में हमार हरियाली छावत हैं.
सैय्याँ हमार पालनहार,
जीवन का असली गहना
पलमे भाई पलमे बहना,
मोती भी वोही सोना भी वोही लागत हैं.
उपरवाले से यही बिनती हमार,
दुबारा जनम दे तो यहीं हरबार,
सैय्याँ बिन अब जीना नहीं,
सैय्याँ बिन दुनिया परायी भावत हैं.
सोमवार, 4 अक्टूबर 2010
राहें
गुमनाम राहें सिखाती हैं हमें,
अकेलेपन में दिया नजर आती हैं हमें.
हजारों रह्गुजरों से इतराती नहीं ,
सुनसान समय में निराश होती नहीं,
सही मायने में जिन्दगी का अंदाज़ सिखाती हैं हमें.
ऊपर, निचे अनगिनत हैं हाल भी,
भले ही कई मोड़ आते हैं फिर भी,
सीधा चलना सिखाती हैं हमें.
भागती जिंदगी का साथ देती हैं.
लगी ठोकर तो उठना सिखाती हैं,
हारे हुए पैरों में जान फूंक देती हैं हमें.
गुमनाम राहें सिखाती हैं हमें,
अकेलेपन में दिया नजर आती हैं हमें.
अकेलेपन में दिया नजर आती हैं हमें.
हजारों रह्गुजरों से इतराती नहीं ,
सुनसान समय में निराश होती नहीं,
सही मायने में जिन्दगी का अंदाज़ सिखाती हैं हमें.
ऊपर, निचे अनगिनत हैं हाल भी,
भले ही कई मोड़ आते हैं फिर भी,
सीधा चलना सिखाती हैं हमें.
भागती जिंदगी का साथ देती हैं.
लगी ठोकर तो उठना सिखाती हैं,
हारे हुए पैरों में जान फूंक देती हैं हमें.
गुमनाम राहें सिखाती हैं हमें,
अकेलेपन में दिया नजर आती हैं हमें.
रविवार, 3 अक्टूबर 2010
तेरे बिना
उदास दिल की ये तन्हाई हैं,
तेरे बिना ये आँख भर आई हैं.
जुस्तजू हैं तेरी,आरजू हैं तेरी,
आ भी जाओ, ना सताओ,
बेकरारी सी छायी हैं.
सुबह से खुबसूरत, तेरी अंगडाई हैं,
हर तरफ तू ही तू नजर आई हैं,
महफ़िल रौनक छोड़कर बेरंग नजर आई हैं.
ना जाने कब होगी मुलाकात,
धडकता सीना, रुकेसे जजबात,
अकेलापन सहा नहीं जाता, दुनिया लगती परायी हैं.
तेरे बिना ये आँख भर आई हैं.
जुस्तजू हैं तेरी,आरजू हैं तेरी,
आ भी जाओ, ना सताओ,
बेकरारी सी छायी हैं.
सुबह से खुबसूरत, तेरी अंगडाई हैं,
हर तरफ तू ही तू नजर आई हैं,
महफ़िल रौनक छोड़कर बेरंग नजर आई हैं.
ना जाने कब होगी मुलाकात,
धडकता सीना, रुकेसे जजबात,
अकेलापन सहा नहीं जाता, दुनिया लगती परायी हैं.
शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010
तेरी बिंदियाँ
देखी जो तेरी बिंदिया
बांवरें मन में प्रीत समाई रे!
उड़ता आँचल, ढलता सावन,
ठंडी अगन, बहती पवन,
झर झर बरसती धाराएँ रे!
जीने की आस, बुझती प्यास,
सुनहरी धुप, चलती सांस,
तुने कैसी लगन लगायी रे!
कत्थई आँखों का ये काजल,
जैसे छाये गहरे बादल,
बारिश की पहली बूंद उतर आई रे!
बांवरें मन में प्रीत समाई रे!
उड़ता आँचल, ढलता सावन,
ठंडी अगन, बहती पवन,
झर झर बरसती धाराएँ रे!
जीने की आस, बुझती प्यास,
सुनहरी धुप, चलती सांस,
तुने कैसी लगन लगायी रे!
कत्थई आँखों का ये काजल,
जैसे छाये गहरे बादल,
बारिश की पहली बूंद उतर आई रे!
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