अँधेरे से यूँ डर लगता हैं,
कहीं खो न जाऊं उन कालकोठरी में.
कितना अजीबसा लगता हैं ,
जो सूरज की चमकती हुयी,
धुप से भी न घबराता था,
आज लगता हैं उन्ही में सिमट न जाऊं मैं.
रात कांटने को दौडती हैं,
टिमटिमाते तारे भी अब मुझे नजर नहीं आते,
सन्नाटे भी अब चिरके निकलते हैं मुझसे,
चन्द्रमा की शीतल छाँव गर्मी को हैं जगाती.
दूर तलक कोई दीप नजर नहीं आता,
रास्ते भी अब सुनसान से नजर आते हैं,
जैसे ही यूँ अंधकार बढ़ता जाता हैं,
पैर खिसकते नजर आते हैं.
अँधेरे का भेद कौन पढता हैं,
उजालों के सच कौन मानता हैं,
सब झूठ हैं उसी पंछी की तरह,
पिंजरे से उड़कर वापस लौटने की तरह.
मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010
शिकवा
जिस बात का डर था वही हुआ,
हम उनसे बिछड़े आखिर वही हुआ .
कई बार खयाल आया की मुड़ जाएँ,
दुख तो जरुर होगा की रुक जाएँ,
मगर दिल था के मानता नहीं था,
अब जाके मान गया लेकिन क्या हुआ.
अब फिरसे वही होगा,
न नींद होगी न चैन होगा,
अब किसे बताएँगे दिल का हाल,
अब रंज होगा न सुकुन होगा.
जिन्दगी को जो पसंद हैं वही तो होता हैं,
कहाँ आखिर सोचा वो सही होता हैं,
देखते हैं जिन्दगी कहाँ ले जाती हैं हमें,
याफिर आखिर कफ़न में खत्म होता हैं
किस किस से नाराज हो जाएँ,
कोई एक कारण हो तो बताएं,
अब कोई गम नहीं हमें,
खुदा सहने की ताकत दे हमें.
हम उनसे बिछड़े आखिर वही हुआ .
कई बार खयाल आया की मुड़ जाएँ,
दुख तो जरुर होगा की रुक जाएँ,
मगर दिल था के मानता नहीं था,
अब जाके मान गया लेकिन क्या हुआ.
अब फिरसे वही होगा,
न नींद होगी न चैन होगा,
अब किसे बताएँगे दिल का हाल,
अब रंज होगा न सुकुन होगा.
जिन्दगी को जो पसंद हैं वही तो होता हैं,
कहाँ आखिर सोचा वो सही होता हैं,
देखते हैं जिन्दगी कहाँ ले जाती हैं हमें,
याफिर आखिर कफ़न में खत्म होता हैं
किस किस से नाराज हो जाएँ,
कोई एक कारण हो तो बताएं,
अब कोई गम नहीं हमें,
खुदा सहने की ताकत दे हमें.
गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010
जिस्म
चांदनी रात के उजालो में,
तेरा जिस्म दुधिया दिखता हैं।
तेरी झुकी नजर,
चिर के ले गयी लफ्ते जिगर,
खुले बालों ने जादू किया,
मदहोशी नींद उडाती हैं।
होश का आलम न पुछो,
मस्ती का आलम न पुछो,
जजबातों ने मचाया हैं कोहराम,
महक भी अब संदल सी लगती हैं।
हसीं समां हैं जवान है रात,
अब न हम हैं न हमारे जजबात,
दमकते हुए गुलाबी रुखसार,
अब दुनिया मचलती लगती हैं।
तेरा जिस्म दुधिया दिखता हैं।
तेरी झुकी नजर,
चिर के ले गयी लफ्ते जिगर,
खुले बालों ने जादू किया,
मदहोशी नींद उडाती हैं।
होश का आलम न पुछो,
मस्ती का आलम न पुछो,
जजबातों ने मचाया हैं कोहराम,
महक भी अब संदल सी लगती हैं।
हसीं समां हैं जवान है रात,
अब न हम हैं न हमारे जजबात,
दमकते हुए गुलाबी रुखसार,
अब दुनिया मचलती लगती हैं।
बुधवार, 13 अक्टूबर 2010
शरमिन्दगी
आँख मुंद के जो होते हुए देखे हैं,
तब मेरी नजर शर्म से झुक जाती हैं.
जब किसी मां बहन की आबरू
लुट जाती हैं सरे बाजार,
हजारों नजरे देखती रह जाती हैं
सब होते हुए लाचार.
तब मेरी नजर शर्म से झुक जाती हैं.
इक तरफ हैं अनाज की किल्लत,
दूसरी तरफ बहती दूध की नदियाँ,
बुंद बुंद प्यास को तरसी ममता,
सबको पता हैं लेकिन कोई नहीं जानता,
तब मेरी नजर शर्म से झुक जाती हैं.
रहते हैं आज भी कई झोपड़ों में,
कई को रहने आलिशान मकान,
रात की नींद भी लेना जहाँ हो चैन,
भगवान की चरनों में करोड़ों की देन,
तब मेरी नजर शर्म से झुक जाती हैं.
आज भी आदमी न बन पाए,
जानवर के साथ श्रुष्टि को भी सताएं,
धर्म के नाम पर करे फसाद,
खुद की ख़ुशी के लिए करे देश बर्बाद,
तब मेरी नजर शर्म से झुक जाती हैं.
तब मेरी नजर शर्म से झुक जाती हैं.
जब किसी मां बहन की आबरू
लुट जाती हैं सरे बाजार,
हजारों नजरे देखती रह जाती हैं
सब होते हुए लाचार.
तब मेरी नजर शर्म से झुक जाती हैं.
इक तरफ हैं अनाज की किल्लत,
दूसरी तरफ बहती दूध की नदियाँ,
बुंद बुंद प्यास को तरसी ममता,
सबको पता हैं लेकिन कोई नहीं जानता,
तब मेरी नजर शर्म से झुक जाती हैं.
रहते हैं आज भी कई झोपड़ों में,
कई को रहने आलिशान मकान,
रात की नींद भी लेना जहाँ हो चैन,
भगवान की चरनों में करोड़ों की देन,
तब मेरी नजर शर्म से झुक जाती हैं.
आज भी आदमी न बन पाए,
जानवर के साथ श्रुष्टि को भी सताएं,
धर्म के नाम पर करे फसाद,
खुद की ख़ुशी के लिए करे देश बर्बाद,
तब मेरी नजर शर्म से झुक जाती हैं.
मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010
आवाज
हर तरफ से कोई जवाब नहीं,
तुझे कहाँ कहाँ आवाज दे.
क्या तु इन सब वाकियों से नाराज हैं,
क्या तुझे इन सभी लोगों से खफा हैं,
लेकिन तु तो कहता हैं के ये तुने ही बनायें हैं,
फिर गलती कहाँ हो रही हैं, उनको कोई सवाब दे.
सब कहते तेरे बन्दे हैं,
फिर भी सबके हाथ गंदे हैं,
क्या कोई तुझसे डरता नहीं,
क्या कोई तुझपे मरता नहीं, इसका कोई हिसाब दे.
सब अपने आप को तुझसे बड़ा मानते हैं ,
जब कोई आति हैं आफत तभी तेरा होना मानते हैं,
सब जानते हुए भी अनजान हैं,
फिर भी तुझसे खुश देखना चाहते हैं, उनको कोई नकाब दे.
तुझे कहाँ कहाँ आवाज दे.
क्या तु इन सब वाकियों से नाराज हैं,
क्या तुझे इन सभी लोगों से खफा हैं,
लेकिन तु तो कहता हैं के ये तुने ही बनायें हैं,
फिर गलती कहाँ हो रही हैं, उनको कोई सवाब दे.
सब कहते तेरे बन्दे हैं,
फिर भी सबके हाथ गंदे हैं,
क्या कोई तुझसे डरता नहीं,
क्या कोई तुझपे मरता नहीं, इसका कोई हिसाब दे.
सब अपने आप को तुझसे बड़ा मानते हैं ,
जब कोई आति हैं आफत तभी तेरा होना मानते हैं,
सब जानते हुए भी अनजान हैं,
फिर भी तुझसे खुश देखना चाहते हैं, उनको कोई नकाब दे.
सोमवार, 11 अक्टूबर 2010
मजे करो
खुश रहो या नाखुश
मजे करो भई मजे करो.
कुछ आये न आये,
दिखाओ ऐसे के उस्ताद हो,
सबपर झाडो रोब,
मजे करो भई मजे करो.
बिन बुलाये मेहमान होकर,
सबसे आगे आओ हंसकर,
लड़ते झगड़ते इनाम पाओ,
मजे करो भई मजे करो.
लोगोंने कितनी भी दी गलियाँ,
दिखाओ ऐसे के बजाई तालियाँ,
फिर भी प्यार की गुजारिश करो,
मजे करो भाई मजे करो.
बेशर्म होकर मांगो भिक,
गिड़गिडाकर पैर पकड़ो ठिक,
बेचकर देशको रहो नेक
मजे करो भई मजे करो.
मजे करो भई मजे करो.
कुछ आये न आये,
दिखाओ ऐसे के उस्ताद हो,
सबपर झाडो रोब,
मजे करो भई मजे करो.
बिन बुलाये मेहमान होकर,
सबसे आगे आओ हंसकर,
लड़ते झगड़ते इनाम पाओ,
मजे करो भई मजे करो.
लोगोंने कितनी भी दी गलियाँ,
दिखाओ ऐसे के बजाई तालियाँ,
फिर भी प्यार की गुजारिश करो,
मजे करो भाई मजे करो.
बेशर्म होकर मांगो भिक,
गिड़गिडाकर पैर पकड़ो ठिक,
बेचकर देशको रहो नेक
मजे करो भई मजे करो.
शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010
भुक
ठोकर आदमी को चलना सिखाती है ,
भुक आदमी को जीना सिखाती है.
इसके लिए लोग कहाँ से कहाँ जाते हैं ,
कई रह्गुजरों को दरबदर कराती है.
रिश्ते भी टिक नहीं पाती इसके आगे,
भाई-भाई को ये आपस में लड़ती है.
जात पात इसके सामने कुछ भी नहीं,
आमिरों को भी ये सजदा करवाती है.
कई लोग खुदको बेचते हैं इसके लिए
माओं को भी ये बेबस करवाती है.
इसके आगे सब लाचार हैं,
भुक होशो हवास सब भुलाती हैं.
भुक आदमी को जीना सिखाती है.
इसके लिए लोग कहाँ से कहाँ जाते हैं ,
कई रह्गुजरों को दरबदर कराती है.
रिश्ते भी टिक नहीं पाती इसके आगे,
भाई-भाई को ये आपस में लड़ती है.
जात पात इसके सामने कुछ भी नहीं,
आमिरों को भी ये सजदा करवाती है.
कई लोग खुदको बेचते हैं इसके लिए
माओं को भी ये बेबस करवाती है.
इसके आगे सब लाचार हैं,
भुक होशो हवास सब भुलाती हैं.
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