बहुत दिनों के बाद लगा के ब्लॉग पे कुछ तो लिखूं। आये दिन कुछ खास नहीं रहा है। आयपीएल खत्म हुआ और लोग भूल भी गए की कुछ हुआ था। बाकि क्रिकेट अब बोअर होता जा रहा है हर दिन मैच देखी नहीं जाती। जैसे हर रोज अच्छा खाना कुछ फीका सा लगता हैं उसी तरह। बारिश हो रही हैं लेकिन उसमे भी अलग सा मजा नहीं आ रहा। कुछ लोग जरुर कहेंगे की हमें हर चीज़ में नयापन ढूँढना चाहिए। भ्रष्टाचार से लोग उकता गए हैं। अन्ना हजारे के अनशन को भी लोग भूल गए हैं। आदमी की सोचने की शक्ति अब कम होते जा रही हैं। इसीलिए लोग बहुत कम समय तक सोचते हैं और भूल जाते हैं।
नया कुछ अच्छा पढने को भी नहीं मिल रहा। लोगोंको वही वही पढ़कर बोअर होने लगा हैं। लोगों को इसीलिए कुछ चटपटा चाहिए। कुछ अलग। खेती और किसान के बारे में पढने को लोगों को इंतना मजा नहीं आता। हाँ अगर प्याज और चीनी के दाम बढ़ गए तो लोग चिल्लाने लगते हैं। सब्जी, दाल और आटे के भाव बढ़ गए गए तो लोगों को लगता हैं किसान हमारी जेब पे डाका डाल रहे हैं। इसीलिए लोग किसान की आत्महत्या के बारे में भी पढना नहीं चाहते। ये भी दिन जायेंगे.
सोमवार, 30 मई 2011
सोमवार, 14 मार्च 2011
दो व्यक्ति
कुछ लोग जिन्दगी में आते हैं और चले जाते हैं। लेकिन कुछ ऐसे होते हैं जो सही मायने में जिन्दगी को एक नया मोड़ देते हैं। उन्हें आगे बढ़ने में सहायता करते हैं। मैं आज दो लोगों की बात करूँगा एक हैं अतुल पेठे और दुसरी हैं अंजलि गुर्जर। पिछले दिनों नाशिक में एक वोर्क्शोप हुआ। जहाँ पे में काम करता हूँ उस लोकमत द्वारा। पहले ही दिन मुझे एक ऐसे शख्स मिले जो मुझसे भी उम्र में बड़े होकर चुस्तिले और फुर्तीले थे। बकाये तौर पे वो काफी नौजवान हैं। ऐसा शख्स मैंने पहले कभी नहीं देखा। इतना की आदमी की प्रतिभा इतनी ज्यादा हो सकती हैं मैंने पहली बार देखा। आपने आप में झाँकने को उन्हों ने सिखाया। मैं भी कई बार दंग रह गया की क्या मुझमे वाकई ऐसा कुछ हैं जिसके तरफ मैं अच्छे नजर से देख सकता हूँ। क्या क्या नहीं सिखाया उन्होंने। चित्रकला, संगीत, नृत्य, नाटक और भी बहुत कुछ। अपने मन के अन्दर की चौथी खिड़की खोलने को उन्होंने सिखाया।
इस भाग दौड़ भरी जिन्दगी से कुछ निज़ात पाने के लिए ये वर्क शॉप जरुरी था। लेकिन जिस प्रकार से अतुल पेठेजी ने हमें सिखाया वो किताब के बाहर भी एक जिन्दगी हैं। उसके तरफ किस नजर से देखे वो पढने जैसा था। हम पत्रकार के अलावा भी कुछ हैं एक इंसान उसीका अंदाज़ा उन्होंने दिखाया। मैं उनकी कला की क़द्र करता हूँ और उन्हें नमन करता हूँ।
एक और हस्ती से मैं मिला उनका नाम था अंजलि गुर्जर। वैसे उनकी मुलाकात एक बस में हुई। मैं रिच डैड एंड पुअर डैड किताब पढ़ रहा था। वो मेरे पास पास वाले सिट पे बैठी थी। कुछ देर बाद उन्होंने पुचा इस किताब में क्या हैं। उसके बाद उन्होंने जो उनके बारे में बताया वो अजब था। एक महिला जो नया सोचती हैं वो सुनके मैं दंग रह गया। क्या क्या नहीं किया उन्हों ने। ट्रेकिंग, राफ्टिंग सभी किया। उनकी और भी बड़ी इच्छा हैं। काश मैं उनकी तरह कुछ कर पाता। मुझे उन्होंने कुछ बताया, या सिखाया मैं जिन्दगी भर नहीं भूल पाऊंगा। बहुत ही उम्दा महिला और बहुत आशादायी महिला। उन्होंने बहुत सारे जगह पे जाके उसका अभ्यास किया हैं। और बार बार जाने की इच्छा भी हैं उनकी। मै काफी खुश हूँ उनसे मिलके और आशा करता हूँ के आगे भी मिलु और उनसे और ज्ञान प्राप्त करू। मैं उनको प्रणाम करता हूँ.
इस भाग दौड़ भरी जिन्दगी से कुछ निज़ात पाने के लिए ये वर्क शॉप जरुरी था। लेकिन जिस प्रकार से अतुल पेठेजी ने हमें सिखाया वो किताब के बाहर भी एक जिन्दगी हैं। उसके तरफ किस नजर से देखे वो पढने जैसा था। हम पत्रकार के अलावा भी कुछ हैं एक इंसान उसीका अंदाज़ा उन्होंने दिखाया। मैं उनकी कला की क़द्र करता हूँ और उन्हें नमन करता हूँ।
एक और हस्ती से मैं मिला उनका नाम था अंजलि गुर्जर। वैसे उनकी मुलाकात एक बस में हुई। मैं रिच डैड एंड पुअर डैड किताब पढ़ रहा था। वो मेरे पास पास वाले सिट पे बैठी थी। कुछ देर बाद उन्होंने पुचा इस किताब में क्या हैं। उसके बाद उन्होंने जो उनके बारे में बताया वो अजब था। एक महिला जो नया सोचती हैं वो सुनके मैं दंग रह गया। क्या क्या नहीं किया उन्हों ने। ट्रेकिंग, राफ्टिंग सभी किया। उनकी और भी बड़ी इच्छा हैं। काश मैं उनकी तरह कुछ कर पाता। मुझे उन्होंने कुछ बताया, या सिखाया मैं जिन्दगी भर नहीं भूल पाऊंगा। बहुत ही उम्दा महिला और बहुत आशादायी महिला। उन्होंने बहुत सारे जगह पे जाके उसका अभ्यास किया हैं। और बार बार जाने की इच्छा भी हैं उनकी। मै काफी खुश हूँ उनसे मिलके और आशा करता हूँ के आगे भी मिलु और उनसे और ज्ञान प्राप्त करू। मैं उनको प्रणाम करता हूँ.
गुरुवार, 30 दिसंबर 2010
गुजरे हुए पलों को कौन लौटा सकता है, आने वाले फिजाओं की रंगत कौन पहचाने, आओ दुआ करे उगते हुए सूरज से, भर दो झोली उन नंगे फकीरों की, आओ फिर से एक हो जाएँ, देश के लिए मिट जाएँ। नए साल की खुशियां मनाते समय उन सभी को याद करे। छोटा हो या बड़ा, आमिर हो या गरीब सबकी खुशियाँ आबाद रहे, दिल हमारा अजीम रहे। सभी को नया साल मुबारक।
मंगलवार, 30 नवंबर 2010
दूर
बुझ गए उम्मीद के चराग
सपनों की लौ बुझ गयी
आशाओं के फूल कुम्हला गए
उसके दूर चले जाने से.
तमन्ना बड़ी देर से मचली थी
मिलने की आस यूँ ही निकली थी
बह गयी सारी यादें
आसुओंकी तूफानी बाढ़ से.
डूबती नैय्या जीवन की
संकट की घडी अमावस की
दूर गूंजती हुयी शहनाई
मलती है रक्त का अबीर.
सहमी हुए रातों में
थके हारे बोझल हाथों में
सन्नाटेपन की सरसराहट
नियतीने भी दिया धोखा.
जीवन अब समाप्त हो गया
यादों के मेले कबके खत्म हुए
अकेला रह गया है शायद नसीब
दोष दे तो देभी किसें.
सपनों की लौ बुझ गयी
आशाओं के फूल कुम्हला गए
उसके दूर चले जाने से.
तमन्ना बड़ी देर से मचली थी
मिलने की आस यूँ ही निकली थी
बह गयी सारी यादें
आसुओंकी तूफानी बाढ़ से.
डूबती नैय्या जीवन की
संकट की घडी अमावस की
दूर गूंजती हुयी शहनाई
मलती है रक्त का अबीर.
सहमी हुए रातों में
थके हारे बोझल हाथों में
सन्नाटेपन की सरसराहट
नियतीने भी दिया धोखा.
जीवन अब समाप्त हो गया
यादों के मेले कबके खत्म हुए
अकेला रह गया है शायद नसीब
दोष दे तो देभी किसें.
शुक्रवार, 26 नवंबर 2010
जानवर
मै गर्दन झुकाए खड़ा हूँ
आदमी होने का इम्तेहान देते
किसी वहशी लुटेरे जानवर की तरह
अपने अन्दर की इंसान को मारकर.
बदशक्ल, बेसुरत अवस्था में
ना कोई पहचनता है मुझको
भेड़ियों की तरह मैं रौंदता हूँ
अपनी यादों की कुदरत को.
ना मेरा कोई रिश्ता है
ना मै किसीका रिश्तेदार
मै बस एक ही अस्त्र लिए खड़ा हूँ
तन्हाईयों की भीड़ में खड़े उस अनजान के लिए.
क्या कुसूर है उसका
क्या उसने सिर्फ मेरी यादों के
दीवारों को टटोला था
सिर्फ इसकी सजा उसे क्यों?
मै उस चिता की तरह
सिर्फ इतना ही जानता हूँ
मुझे सिर्फ जलाना है
आदमी के अन्दर के गुरुर को
आदमी होने का इम्तेहान देते
किसी वहशी लुटेरे जानवर की तरह
अपने अन्दर की इंसान को मारकर.
बदशक्ल, बेसुरत अवस्था में
ना कोई पहचनता है मुझको
भेड़ियों की तरह मैं रौंदता हूँ
अपनी यादों की कुदरत को.
ना मेरा कोई रिश्ता है
ना मै किसीका रिश्तेदार
मै बस एक ही अस्त्र लिए खड़ा हूँ
तन्हाईयों की भीड़ में खड़े उस अनजान के लिए.
क्या कुसूर है उसका
क्या उसने सिर्फ मेरी यादों के
दीवारों को टटोला था
सिर्फ इसकी सजा उसे क्यों?
मै उस चिता की तरह
सिर्फ इतना ही जानता हूँ
मुझे सिर्फ जलाना है
आदमी के अन्दर के गुरुर को
रविवार, 21 नवंबर 2010
तुम
कितने दिनों के बाद मिली हो
क्या अब भी तुम वैसी ही हो?
अजीब चेहरों से उलझे हुए
सवालों के सायें से लिपटे हुए
अनगिनत नजरों को तुम
अपनीसी लगती थी
क्या अब भी तुम वैसी ही हो?
हसीं पलों में हर एक चाहता था
उन लम्हों की तुम साजदार बनो
अपनी खुबसूरत सी हसी बिखेरकर
सब को आबाद करो
क्या अब भी तुम वैसी ही हो?
परेशानी किसको नहीं होती?
लेकिन तुम्हारी जुल्फों के साए में
चमकती धुप भी
छाँव की तरह लगती थी
क्या अब भी तुम वैसी ही हो?
जिन्दगी के मायने बदल गए है
जीने के अंदाज़ भी कुछ अलग लगते है
इस हैरान सी वीरानी में
एक साथ भी जरुरी है
क्या अब भी तुम वैसी ही हो?
क्या अब भी तुम वैसी ही हो?
अजीब चेहरों से उलझे हुए
सवालों के सायें से लिपटे हुए
अनगिनत नजरों को तुम
अपनीसी लगती थी
क्या अब भी तुम वैसी ही हो?
हसीं पलों में हर एक चाहता था
उन लम्हों की तुम साजदार बनो
अपनी खुबसूरत सी हसी बिखेरकर
सब को आबाद करो
क्या अब भी तुम वैसी ही हो?
परेशानी किसको नहीं होती?
लेकिन तुम्हारी जुल्फों के साए में
चमकती धुप भी
छाँव की तरह लगती थी
क्या अब भी तुम वैसी ही हो?
जिन्दगी के मायने बदल गए है
जीने के अंदाज़ भी कुछ अलग लगते है
इस हैरान सी वीरानी में
एक साथ भी जरुरी है
क्या अब भी तुम वैसी ही हो?
शनिवार, 20 नवंबर 2010
भावना
तेरे हाथों की मेहदी देख
मेरे हाथ उठते हैं दुआ के लिए.
मुझे याद हैं वो सर्द भरी शाम
जब पहली बार तुमने
मुड के देखा था मुझे
तुम्हारी वो जादूभरी हसी से
मै सिकुड़ सा गया बिलकुल
कम्बल में खामोश पांवों की तरह.
बरसाती दिनों में हम
जब भीगे थे एकसाथ
तुम्हारी आँचल से गिरता हुआ पानी
मेरे तनबदन को कांपती हुई रूह की तरह
सर से लेके पाँव तक एक निशब्द गहरी सांस.
मचलती धूप में जब तुम निकलती थी
किरणों के साथ हमारी बदन की तपिश
बिस्तर पे पड़ा हुआ प्यासा मन
सब एक दहलती हुई आग की तरह
अंगारों की राख को टटोलता हुआ.
अब भूलना चाहता हूँ वो सारे पल
सीप से निकला हुआ मोती बनके
उसके सेज पे सजाना चाहता हूँ
उसके पीले बदन और हाथों की हिना
मेरे कर्मों का फल समझकर
मै चुप रहूँगा तेरे यादों की तन्हाई में.
मेरे हाथ उठते हैं दुआ के लिए.
मुझे याद हैं वो सर्द भरी शाम
जब पहली बार तुमने
मुड के देखा था मुझे
तुम्हारी वो जादूभरी हसी से
मै सिकुड़ सा गया बिलकुल
कम्बल में खामोश पांवों की तरह.
बरसाती दिनों में हम
जब भीगे थे एकसाथ
तुम्हारी आँचल से गिरता हुआ पानी
मेरे तनबदन को कांपती हुई रूह की तरह
सर से लेके पाँव तक एक निशब्द गहरी सांस.
मचलती धूप में जब तुम निकलती थी
किरणों के साथ हमारी बदन की तपिश
बिस्तर पे पड़ा हुआ प्यासा मन
सब एक दहलती हुई आग की तरह
अंगारों की राख को टटोलता हुआ.
अब भूलना चाहता हूँ वो सारे पल
सीप से निकला हुआ मोती बनके
उसके सेज पे सजाना चाहता हूँ
उसके पीले बदन और हाथों की हिना
मेरे कर्मों का फल समझकर
मै चुप रहूँगा तेरे यादों की तन्हाई में.
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