गुरुवार, 11 नवंबर 2010

जिंदगी

कहीं फासलों से गुजरती हुई जिन्दगी
क़दमों के निशान छोड़ जाती है
अँधेरे में चमकते हुए तारों की तरह
आती जाती रहती है.

तन्हाईयाँ पुकारती है
शहनाईयों की तरह
दिल के क़दमों की आवाज़ आती है
छन छन करती पायल की तरह.

वादियाँ अलग सी लगती है
नदियाँ गीत गाती है
भंवरें भी गुनगुनाते है
दिलरुबा लगती है ये जमीन.

तेरी गर्म बाहें
तेरी नर्म सांसे
जान मेरी यूं लेती है,
जैसे चुराकर कोई नींद.

1 टिप्पणी:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति संवेदनशील हृदयस्पर्शी मन के भावों को बहुत गहराई से लिखा है

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