गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

इश्क

जीने के अंदाज़ बदल गए हैं अभीसे,
जबसे किया हैं मैंने इश्क तुझीसे.

कोई शउर, कोई सुकून भूला बैठा हूँ,
दिन रात एक सी हैं, हर पल भुला हूँ.

अब तेरी साँसों का सहारा हैं,
अब तेरी जुल्फों का आसरा हैं.

सुबह कब हुयी, शाम कब ढली किसको पता,
भूक कैसी हैं, प्यास कैसी किसको पता.

लहरों का उछलना मुझको भाता नहीं,
बादलों का बरसना रास आता नहीं.

बिजली भी अब नमसी गयी हैं तेरे आगे,
गहरी सांस भी थम सी गयी हैं तेरे आगे.

ये इश्क हैं या खुदा की देन,
अब न मैं रहा न कोई चैन.

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

अजनबी

आदमियों की भीड़ में खुद को अकेला पाता हूँ,
कई चेहरों से मिलकर भी अजनबी सा दिखता हूँ.

पास होकर भी सभी कहाँ अपने होते हैं,
मीठी नींद में देखे हुए सपने कहाँ सच्चे होते हैं.

मुस्कुराते हुए चला जाता हूँ.
शोलों को सीने में दफनाये जाता हूँ.

मायूसी का आलम यूं है
ख़ामोशी का डर यूं हैं.

आज भी तन्हाई अच्छी लगती हैं
दर्द होकर भी सच्ची लगती हैं.

मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

हमार सैय्याँ

सैय्याँ हमार घर आवत हैं,
खुशियों की बहार आवत हैं.

सैय्याँ हमार बचपन,
रुठत हैं तो मनावत भी हैं,
दर्द होत तो रोवत भी हैं,
माँ बाप से बढ़कर प्यार करवत हैं.

सैयाँ हमार बगियन,
झूमता पेड़, नाचता आँगन,
शर्माता जैसे टपोरा बैंगन,
जीवन में हमार हरियाली छावत हैं.

सैय्याँ हमार पालनहार,
जीवन का असली गहना
पलमे भाई पलमे बहना,
मोती भी वोही सोना भी वोही लागत हैं.

उपरवाले से यही बिनती हमार,
दुबारा जनम दे तो यहीं हरबार,
सैय्याँ बिन अब जीना नहीं,
सैय्याँ बिन दुनिया परायी भावत हैं.

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

राहें

गुमनाम राहें सिखाती हैं हमें,
अकेलेपन में दिया नजर आती हैं हमें.

हजारों रह्गुजरों से इतराती नहीं ,
सुनसान समय में निराश होती नहीं,
सही मायने में जिन्दगी का अंदाज़ सिखाती हैं हमें.

ऊपर, निचे अनगिनत हैं हाल भी,
भले ही कई मोड़ आते हैं फिर भी,
सीधा चलना सिखाती हैं हमें.

भागती जिंदगी का साथ देती हैं.
लगी ठोकर तो उठना सिखाती हैं,
हारे हुए पैरों में जान फूंक देती हैं हमें.

गुमनाम राहें सिखाती हैं हमें,
अकेलेपन में दिया नजर आती हैं हमें.

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

तेरे बिना

उदास दिल की ये तन्हाई हैं,
तेरे बिना ये आँख भर आई हैं.

जुस्तजू हैं तेरी,आरजू हैं तेरी,
आ भी जाओ, ना सताओ,
बेकरारी सी छायी हैं.

सुबह से खुबसूरत, तेरी अंगडाई हैं,
हर तरफ तू ही तू नजर आई हैं,
महफ़िल रौनक छोड़कर बेरंग नजर आई हैं.

ना जाने कब होगी मुलाकात,
धडकता सीना, रुकेसे जजबात,
अकेलापन सहा नहीं जाता, दुनिया लगती परायी हैं.

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

तेरी बिंदियाँ

देखी जो तेरी बिंदिया
बांवरें मन में प्रीत समाई रे!

उड़ता आँचल, ढलता सावन,
ठंडी अगन, बहती पवन,
झर झर बरसती धाराएँ रे!

जीने की आस, बुझती प्यास,
सुनहरी धुप, चलती सांस,
तुने कैसी लगन लगायी रे!

कत्थई आँखों का ये काजल,
जैसे छाये गहरे बादल,
बारिश की पहली बूंद उतर आई रे!

बुधवार, 29 सितंबर 2010

तेरे कदम

चलूँ मैं साथ तेरे
कदम से कदम मिलाके.

कई बार चलूँ तुझसे कन्धा मिलाके
हाथ से हाथ धरे साथ मिलाके.

कई बार चलूँ तेरे आगे
रास्तें पे बिखरे काँटों पे चलके.

तेरे पिछे चलने भी लगती हैं ख़ुशी
रक्खे हैं जिस मिटटी पे कदम तुमने.

तुम कहीं भी हो तो सच इतनासा हैं,
दिल के हर कोने बसा एक सपनासा हैं.