न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की
न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की
इक लडका था। उसे पढना काफ़ि पसंद था। कोई चीज अच्छी लगी तो काफ़ि तारीफ करना उसकी आदत थी। इक लडकी को वो काफ़ि अरसे से जानता था। उस लडकी की के साथ वो काफ़ि अदबी से बात करता था।
उस लडकी ने इक दिन लिखना शुरु किया। उसने लडके को पढने के लिए भेज दिया। लडके ने भी उसे पढके गलतियां निकाल के वापस भेज दिया। वो लडका उस लडकी के लिखावट से काफ़ि प्रभावित हुआ। उसने उस लडकी से कहा। आप काफ़ि अच्छा लिखती हैं। आपको पढना मुझे अच्छा लगता है।
फिर हर रोज
ये सिलसिला काफ़ि दिनो तक चला। वो लडका भी लिखता। कुछ शायरी भी करता और उस लडकी को भेजता। वो लडकी भी उसकी हौसला अफजाई करती।
लडका दिल से लडकी के ब्लॉग की तारीफ करता। और कुछ और लगा तो बोलता भी। दोनो मे अच्छे ताल्लुकात थे।
इक दिन लडके ने कहा आज ब्लॉग नहीं लिखा क्या डिअर? मुझे पढना अच्छा लगता है। उस लडकी ने उसे अलग रूप से लिया। और उसने उसी लडके को व्हाट्स अँप पे ब्लॉक किया। उस लडके को समझ नहीं आया, उसका गुनाह क्या था। उसे बहुत बडा सदमा पहूंचा। उसे रात भर निंद नहीं आई। उसे कारण पुछने का वक्त नहीं मिला। उसे कुछ भी नहीं सुझ रहा था। उसकी आँखे डबडबाई। वो अपने आपको कोसता हुआ चुप रहा। उसका दिल साफ था। उसमे कोई बुरी बात नहीं थी। लेकिन वो कुछ ना बोलते हुये चुप रहा। वो जानता था उस लडकी को गलती का अहसास जरूर होगा।
जिंदगी एक सुलगती सी चिता है साहिर
जर्रे जर्रे में जान है प्यारे
जिंदगी इस कोरोना के बाद एक सुलगती सी चिता बन गई है। पता नहीं कब किसी गली की मोड़ पर शाम हो जाएँ। गंगा में बह रहें शव आज इस बेबसी का आलम बता रहें हैं की, मरने के बाद आने वाले दिनों का क्या हाल है। बहरहाल इस जिंदगी से गले लगाना सीखें। सभी के साथ अच्छा बर्ताव करे। इस कोरोना काल में हमने कई अपनों को खोया है। कितनों ने कैसी जिंदगी बसर की है तनहा तनहा पता नहीं। उनका दुख हम नहीं बता सकते। काश इस दुनिया का दुख हम बाँट सकते और उनके जख्मों पे मरहम लगा सकते। फ़िलहाल हम उन सभी के प्रति अपनी हमदर्दी बाँट सकते हैं। उन सभी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा हूँ मैं। आने वाले दिनों में सारा समाज एक होकर ऐसे दिनों का सामना करने के लिए प्रतिबद्ध होगा ऐसी अपेक्षाएं है। शुक्रिया।
महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के मोहोल तहसील में शिरापुर नाम का एक गाँव. छोटासा क़स्बा जहाँ पे शशिकांत धोत्रे का जनम हुआ. बचपन से गरीबी के मार से झुझते हुए बड़ा होता शशिकांत एक सपना संजोये हुए था. उसे चित्रकारी से लगाव था. लेकिन गरीबी के मारे वो आगे नहीं जा सकता था. ऐसे में उसने १० वी तक लगभग पढलिख लिया. उसके बाद उसे दुसरे लड़कों की तरह काम की तलाश के लिए निकलना पड़ा. गाँव के पास नदी से रेती निकलने वाले ट्रक पर वो मजदुर की हैसियत से जाने लगा. लेकिन उसे अपना मूल आधार चित्रकला गंवाना नहीं थी. ऐसे में उसने एक चित्र तैयार करके दिखाया. तो उसके दोस्तों से उसे चित्रकला की प्राथमिक शिक्षा लेने की सलाह दी. उसने वो भी किया. लेकिन उसे पैसे नहीं मिले.
उसके बाद १२ तक की पढाई की. वो मुंबई चला गया. वहां कुछ छोटे मोटे कम करना शुरू किया. फिर भी उसे कुछ अलग करना था. एक स्पर्धा के लिए अपना चित्र भेजा जिसे प्रथम पारितोषिक मिला. शशिकांत का हौसला बढ़ा. कुछ ने उसे जे. जे. आर्ट कॉलेज में जाने की सलाह दी. लेकिन उसके पास इतने पैसे नहीं थे. वहां जाकर भी उसे वापस आना पड़ा. वो कॉलेज छोड़ना पड़ा. फिर पहले की तरह वो बेकार सा घूमता रहा.
फिर शशिकांत ने पोस्टर्स तैयार करना शुरू किया इन, आउट, एक्सिट के बोर्ड लिखकर उसने अपनी जिन्दगी गुजारना शुरू की. उसकी पहली पेंटिंग्स ३००० रुपयों में बिकी. उसके बाद उसने पीछे मूड कर नहीं देखा.