शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

चलो इक बार फिर से...

 


 न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की

न तुम मेरी तरफ़ देखो गलत अंदाज़ नज़रों से
 
चलो इक बार फिर से, अजनबी बन जाएं हम दोनो...

साहिर लुधियानवी जी ने बेहद अंदाज मे लिखे हुई इस नज्म को रवी जी ने खुबसुरत संगीत से नवाजा है। महेंद्र कपूर जीने बेहतरीन तरिके से इसे गाया है। कई प्रेमी जब बिछडते है इसी गीत का सहारा लेते है। तार्रुफ़ रोग हो जाये तो उसको भूलना बेहतर, ताल्लुक बोझ बन जाये तो उसको तोड़ना अच्छा। मतलब पानी सर के उपर से जाए तो वो रिश्ता कोई भी हो उसे तोडना ही अच्छा होता है। कोई भी रोग जादा दिन तक सांभाल नही सकते। उसे अच्छे डॉक्टर पास जाकर उसपे इलाज करना बेहतर होता है। इश्क का हाल भी उसी तरह है।
वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन, उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा। मतलब अगर कोई मंजिल तर ना पहुंचना हो तो रास्ता बदलना बेहतर होता है। इश्क का भी इसी तरह है। अगर वो मंजिल तक ना पहुंचता हो तो उसे अच्छा सा मोड देकर दुसरा रास्ता अपनाना पडता है।
हम कितना भी अच्छा रहने की कोशिश करे, लेकिन पता नहीं, लोग आपको किस नजरिए से देखेंगे। इसिलिए अपना काम करते रहो। लोगों की तरफ ध्यान मत दो। अच्छे काम करते रहो। आपको पता होता होता है, आप किस नजरिए से काम कर रहें है। काम करते रहो। इक ना इक दिन लोगों का नजरिया बदलेगा।


गुरुवार, 29 जुलाई 2021

गलतफहमी की सजा

 इक लडका था। उसे पढना काफ़ि पसंद था। कोई चीज अच्छी लगी तो काफ़ि तारीफ करना उसकी आदत थी। इक लडकी को वो काफ़ि अरसे से जानता था। उस लडकी की के साथ वो काफ़ि अदबी से बात करता था।

उस लडकी ने इक दिन लिखना शुरु किया। उसने लडके को पढने के लिए भेज दिया। लडके ने भी उसे पढके गलतियां निकाल के वापस भेज दिया। वो लडका उस लडकी के लिखावट से काफ़ि प्रभावित हुआ। उसने उस लडकी से कहा। आप काफ़ि अच्छा लिखती हैं। आपको पढना मुझे अच्छा लगता है।

फिर हर रोज


वो लडकी रोज लिखती और उस लडके को पढने भेजती। वो लडका वो हर रोज पढता और उस लडकी की हौसला आफजाई करता। उसका तरिका गरमजोशी का था।

ये सिलसिला काफ़ि दिनो तक चला। वो लडका भी लिखता। कुछ शायरी भी करता और उस लडकी को भेजता। वो लडकी भी उसकी हौसला अफजाई करती।

लडका दिल से लडकी के ब्लॉग की तारीफ करता। और कुछ और लगा तो बोलता भी। दोनो मे अच्छे ताल्लुकात थे।

इक दिन लडके ने कहा आज ब्लॉग नहीं लिखा क्या डिअर? मुझे पढना अच्छा लगता है। उस लडकी ने उसे अलग रूप से लिया। और उसने उसी लडके को व्हाट्स अँप पे ब्लॉक किया। उस लडके को समझ नहीं आया, उसका गुनाह क्या था। उसे बहुत बडा सदमा पहूंचा। उसे रात भर निंद नहीं आई। उसे कारण पुछने का वक्त नहीं मिला।  उसे कुछ भी नहीं सुझ रहा था। उसकी आँखे डबडबाई। वो अपने आपको कोसता हुआ चुप रहा। उसका दिल साफ था। उसमे कोई बुरी बात नहीं थी। लेकिन वो कुछ ना बोलते हुये चुप रहा। वो जानता था उस लडकी को गलती का अहसास जरूर होगा।

बुधवार, 28 जुलाई 2021

ये धुआं कहां से उठता है

 



देख तो दिल कि जाँ से उठता है
ये धुआँ सा कहाँ से उठता है
मीर तकी मीर साहब ने क्या कमाल का कलाम लिखा है। मेहंदी हसन साहब ने बहुत ही बेहतरीन गाया है। वैसे तो हम कहते रहते है, जहाआग हो, वहाँ से धुआं उठता ही है। ये जो आग है, वो अंदर की हो या बाहर कि, उसका धुआं आना लाजमी है। हमारे अंदर कुछ न कुछ चलता रहता है। कभी कभार उसे चिंगारी मिल जाती है और आग लगना मुमकीन होता है। कभी कभी अंदर ही अंदर सुलगता धुआं एक बडी सी आग के रुप मे आगे आता है। हम ये भी कहते हैं के धुआं उठने से पहले उस पर काबू करना चाहिए वरना आग अपने काबू से बाहर हो जाती है। इसका मतलब ये भी है के कोई भी मसला जल्द से जल्द निपटना चाहिए। किसी भी सवाल का जवाब जरुर होता है, लेकिन उसका हल निकलना हो तो, वरना वो सवाल आगे चल कर बडा मसला बन जाता है। फिर उसका जवाब ढुंढने में वक्त लगता है। कई बार साल गुजर जाते है।
मीर साहब लिखते हैं, इश्क़ इक 'मीर' भारी पत्थर है , कब ये तुझ ना-तवाँ से उठता है।  इश्क जरुर भारी पत्थर होगा, लेकिन उसे निर्बल भी उठा सकता है, जब तक उसे इश्क ना हो। मतलब कोई भी चीज़ इश्कसे बेहतर नही। इश्क करना और मुकम्मल करना कईओं के लिये इबादत है, पूजा है। सो इश्क करने से पहले हर इक के दिल मे इक धुआं सा उठता है। आगे चल कर इश्क इक आग बन जाती है। उसे रोक पाना मुश्किल बन जाता है।
बैठने कौन दे है फिर उस को, जो तिरे आस्ताँ से उठता है। तुम्हारे दहलीज से उठने के बाद वो बैठने का नाम नही लेता। वो आगे चलते जाता है। उसके दहलीज पर आने के बाद उसे इक मुकम्मल जहाँ हासिल होता है। उस दिल को बडा सहारा मिल जाता है। फिर वो बैठना नही चाहता आगे चलते जाना उसे पसंद है।
इससे ये पता चलता है के, नाला सर खींचता है जब मेरा, शोर इक आसमाँ से उठता है। ये सारा शोर आसमाँ से उठता है जब फरियाद लेके कोई आता है। इश्क की दास्तां क्या खुब लिखी है मीर साहब ने। ये गज़ल वाकई काबिले तारीफ है।

सोमवार, 26 जुलाई 2021

इक बार तुझे देखा है.....

 




कुछ देर पहले रेडिओ पर इक गीत सुना
खुलके बिखरे जो महकते गेसु
घुल गई जैसे हवा में ख़ुशबू
मेरी हर साँस तो महकाते हुए
ख़ुद पे इतराते हुए, ख़ुद से शर्माते हुए
एक बार तुझे देखा है ...
एक बेहतरीन गाना... सुनने मे काफी अच्छा लगता है। इस के कई मायने हैं। कारण भी हैं। नक्ष लायलपुरीजी ने काफी बढिया लिखा है। खय्याम साहब का संगीत बेहद खुबसुरत है। किशोर कुमार और लता जीने इस गीत के हर शब्द को उंचाई पर पहुंचाया है। राजेश खन्ना, जयाप्रदाजी पर फिल्माया यह गीत है। हर प्रेमी अपने प्रेमी को कुछ न कुछ अलग अंदाज मे कहना चाहता है। कईयों को शब्द नही मिलते तो कईयों को कहना नही आता। इस प्यार भरे गीतने उन सभी प्रेमियों को कहने का साहस दिलाया है। नक्ष लायलपुरी जी अपने प्यार भरे अंदाज के लिए पहचाने जाते हैं। खय्याम साहब का संगीत तो अलग ही है। खुबसुरत राजेश खन्ना जी और जयाप्रदा जी ने इसे चार चाँद लगा दिये है।
प्रेम इक मधुरतम भावना है। उसे परिभाषित करना उचित नहीं। जिस तरह बहती हवा को या फूलों की खुशबु को हम देख नहीं सकते जबकि उसे अनुभव कर सकते हैं। वैसा ही प्यार है। प्रेम अनंत है। आप जितने निकटतम जायेंगे उतना अधिक सुंदर अनुभव आप कर सकते हैं। प्रेम की बात हर कोई कर सकता है, लेकिन पर इसकी समझ कोई विरले को ही हो सकती है।
ये गीत उसी कडी मे प्यार की परिभाषा को चित्रित करता है। इसका संगीत इस भाषा एक सूत्र मे बांधता है। इसी लिये ये गीत अधिक लोकप्रिय हुआ। आज ये गीत सुनते हुये प्यार की अनुभुती हुई।

रविवार, 25 जुलाई 2021

बारिश की बुंदे



घने बादलोंसे इक अजीब हलचल मच गई थी। बारिश आने के आसार कुछ जादा थे। लोक जल्दी जल्दी अपने घर पहुंचना चाहते थे। आकाश को जाने की उतनी जल्दी नही थी। वो अपना काम अपने तरीके से निपटाना चाहता था। अंधेरा सा छाया हुआ था। थोडी देर मे उसने अपना सारा काम निपटा लिया और वो ऑफिस के निचे आ के रुक गया। बारिश ही हलकी बुंदे गिरने लगी थी। आकाश को फिकर नही थी। वो बारिश मे निकलकर ऑफिस के सामने बस स्टॉप पर आकर रुका। अभी उसकी बस आने मे देर थी। उसने सोचा कुछ खा लेते हैं। सामने से एक मुंगफलियां बेचनेवाला जा रहा था। उससे उसने कुछ मुंगफलियां खरिदी और बस आने का इंतजार करने लगा। बस स्टॉप पर भीड नही थी। अचानक उसके बाजू मे इक गोरी सी लडकी आके रुक गई। उसने आकाश से पुछा, मलाड बस आई क्या। आकाश को पता नही था। फिर भी उसने कहा, नहीं अभी। बारिश मे भीगकर उस लडकी का बदन छरहरा सा लगने लगा था। मुंगफलि फेंकते समय आकाशने उस देख लिया था। ऐसे मौसम में इतनी खुबसुरत लडकी को देखकर उसे कुछ सुझ नही रहा था। वो लडकी बार बार रस्ते पे आने वाले बस को देखती और न होने पर बस स्टॉप पे आ कर रुकती। थोडी देर हो रही थी, तो उस लडकी के चेहरे पर चिंता थी। आकाश ने फिर हडबडी मे पुछा, आप कहां जाने वाली है, लडकी ने कहा मलाड। आकाश ने बोला मैं भी मलाड ही जा रहा हुँ। इस्ट या वेस्ट, लडकी ने कहा वेस्ट। आकाश ने कहा मैं भी। क्यों न रिक्षा करके जाऐं। लडकीने आकाश की तरफ देख लिया। उसके मन ही मन में आकाश के बारे मे अलग सोच थी, लेकिन देर हो जाने की वजह से उसने कहा, ठीक है। फिर आकाश ने सामने से जानेवाले रिक्षावाले से पुछा, मलाड चलोगे, उसने कहां, हाँ। दोनो रिक्षा मे बैठ गये। रास्ते में दोनो कम ही बात कर रहे थे। आकाशने उससे जादा कुछ पुछा नहीं। कहाँ काम करती हो, टाईम क्या है, हमेशा इसी बस से आती हो क्या आदि। मलाड वेस्ट में एक जगह वो लडकी उतरी। पैसे दिये और निकल पडी। सामने वाले बिल्डिंगमे वो गई। आकाश उस लडकी को आखिर तक देखता रहा। बारिश मे वो भीगा था, लेकिन लडकी को देखकर वो सारा गिलापन भुल गया था। मन ही मन उसके लड्डु फुटने लगे थे। वो दुसरे दिन का इंतजार करने लगा। उस लडकी के घर के सामने वाले बस स्टॉप पे।

रविवार, 18 जुलाई 2021

हमदर्दी

जिंदगी एक सुलगती सी चिता है साहिर
जर्रे जर्रे में जान है प्यारे
जिंदगी इस कोरोना के बाद एक सुलगती सी चिता बन गई है।  पता नहीं कब किसी गली की मोड़ पर शाम हो जाएँ।  गंगा में बह रहें शव आज इस बेबसी का आलम बता रहें हैं की, मरने के बाद आने वाले दिनों का क्या हाल है। बहरहाल इस जिंदगी से गले लगाना सीखें। सभी के साथ अच्छा बर्ताव करे। इस कोरोना काल में हमने कई अपनों को खोया है। कितनों ने कैसी जिंदगी बसर की है तनहा तनहा पता नहीं। उनका दुख हम नहीं बता सकते।  काश इस दुनिया का दुख हम बाँट सकते और उनके जख्मों पे मरहम लगा सकते।  फ़िलहाल हम उन सभी के प्रति अपनी हमदर्दी बाँट सकते हैं। उन सभी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा हूँ मैं। आने वाले दिनों में सारा समाज एक होकर ऐसे दिनों का सामना करने के लिए प्रतिबद्ध होगा ऐसी अपेक्षाएं है।  शुक्रिया।



शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

संघर्ष

चलो कही बैठते हैं , लडकी बोली
कहां, लडके ने पुछा
यही पास वाले कॉलेज के पेड के नीचे
फ़िर वो दोनो चलने लगे
एक दुसरे के तरफ वो देखते कभी खुद पे हसते
उसने पुछा तुम काफी लंबी हो
लडकी हसकर बोली जादा नही, तुमसे थोडी छोटी हु
फिर वो अपने आपसे उसकी उंचाई को नापने लगा
कंधे तक वो उसे देखता था
दोनो फिर एक कॉलेज के सुनसान पेड के पास जा बैठे
कुछ दर तक को वो दोनो कुछ न बोले
अरे वो छोटा वाला लडका अच्छा है, लडके ने कुछ बोलने के लिये कहा
वो मुस्कराई, हां वो मुझसे छोटा है
लेकीन उसकी एक प्रोब्लेम है उसकी गर्लफ्रेंड शादी को मना कर रही है
लडका सिरिअस हो गया
वो बोली दोनो अलग जाती कें है
लडकी पहले तय्यार थी  अब ना  बोल रही है
फिर अब क्या होगा
लडका कह रहा है शादी करुंगा तो सिर्फ उसीसे
थोडी दर वो चुप रहे
लडके को अहसास हो गया था
वो आगे की सोच रहा था , दुनिया से काफी लडना होगा
संघर्ष के लिये तय्यार हो जावो



बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

कॉफी की गर्माहट

क्या पिओगे, लडकी ने लडके से रेस्तरां में पुछा 
अब लडका इधर उधर देखने लगा, उसे कुछ सुझ नही रहा था. 
चलो नेस्कॅफे पिते है, लडकी बोली
अभी वो कुछ बोलने के मुड में नही था 
अपनी गर्दन हिलाते हुए लडके ने हामी भरी. 
अब क्या करे उसके आगे बडा सवाल था 
किसी लडके के साथ रेस्तरां में जाने का उसका पहला मौका था 
वो रेस्तरां में इधर उधर देखने लगा 
लडकी ने ये पहचाना था. उसकी आंखो में आंखे डालके वो उसे देख रही थी 
लडका काफी शर्माकर कभी उसके तरफ देखता तो कभी वेटर की तरफ 
दोनो के बीच एक अजब सी उलझन थी 
लडकी ने कहा बोलो 
लडका सिर्फ़ हस रहा था, मानो वो कह रहा हो क्या बोलुं 
उसने कहा ये रेस्तरा कौनसा है, लडकी हसने लगी 
उसने पुछा क्या हुआ, लडकी ने कहा हम इधर कॉफी पिने आए हैं होटल के बारे में जानकारी के लिये नही 
कॉफी पिते पिते वो कभी लडकी को देखता कभी कॉफी के प्याली को. 
उसे अच्छा भी लग रहा था और ये डर भी था क्या बोलुं 
धिरे धिरे कॉफी खत्म होती रही और उसकी गर्माहट भी 


सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

पहली मुलाकात

अरे कहां हो, तुम्हे कैसे पह्चानुंगी. पहली बार जो मिल रहे हैं 
स्टेशन के बाहर आते ही  उसने फोन पे पुछा 
उसने कहा, कमाल करती हो. 
तुम्हे कैसे पहचान पाउंगी, चलो तुमने क्या पहना है, 
उसने कहा, कपडे. 
हाहाहाहा, वो जोर से हसने लगी
अरे बाबा मेरा मतलब है कौनसे कपडे पहने है 
ली वाईस की  जीन्स और जोडीयक का शर्ट. 
स्टेशन के बाहर आकर स्टेडीअम के रास्ते की  तरफ वो बढ गया 
थोडी देर आगे बढ गया  के पिछे से हॉर्न की आवाज आई. 
उसने पिछे मुडकर देखा तो वो सन्न रह गया 
इतने दिनो से वो जिससे फोन पे बाते करता था, वोही उसके सामने खडी थी. 
जिस प्रकार से उसे सिधी सादी लडकी समझता था, बिलकुल उसके विपरित उसे दिखा 
कुछ देर तक भौचक्का रहने के बाद, क्या देख रहे हो आवाज से ही वो होश में आया. 
जीन्स और लम्बासा शर्ट  पहने हिरो होंडा बाईक पर खडी थी वो 
ऐसा देख उसको  काफी ख़ुशी हो रही थी, मानो इसे कैसे अचरज में डाला 
फिर नजदीक आकर कहा, बैठ जावो किसी रेस्तरा में जातें हैं 
जिंदगी में पहली बार किसी लडकी को घुमाना तो दूर लडकी के पिछे बैठा था वो 
पिछे बैठते ही अजीब सी खुशबू उसके दिमाग मी दौडने लगी. स्प्रे का नाम नही मालुम था, लेकिन वो सुनहरी सुगंध अपने मन मे समाये गाडी पे बैठ के जा रहा था, कोई परी थी जो उसे उडाये लिये जा रही थी. दुर बहुत दुर. वो भी उडकर जा रहा था. 





रविवार, 15 फ़रवरी 2015

क्यो अच्छी लगती हो

तुम तब्बु के फ़ैन हो क्या, मैने उससे पुछा,
उसके ओर्कुट प्रोफाईल पे तब्बु का फोटो देखकर मै उससे जी चाट पर बाते कर रहा था
उसने कहा, हां
मैने कहा, क्यु
उसने कहा, ऐसेही मुझे अच्छा लगा इसीलिये
तुम्हे क्यू पसंद है वो, उसने पुछा
अब क्या जवाब दु ,सुझ नही रहा था.
मैने कहा अच्छी लगती है. लंबी है, खुबसूरत है.
उसने कहा, ओह ऐसा है
मैने कहा हा, मुझे अच्छी लगती है
उससे जी चाट पर बाते करते समय ऐसा लग रहा था मानो मै तब्बु से बाते कर रहा हुं.
मै ऎसी बातो का कायल नही था लेकिन मुझे अच्छा लग रहा था. न जाने क्युं मै अपने आपको उसके आगे समर्पित कर रहा था. बहाना तब्बु का था लेकिन मै उसे उस रुप में देख रहा था. अच्छा लग रहा था उससे बाते करते वक्त. ठंड भी थी लेकिन एक अजब कि कशिश थी उन बातो में.


शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

मां या डायन

आज लंडन कि एक खबर पढकर बहुत गुस्सा आया . कुरान की आयतों को याद न कर पाने के कारण एक मां ने अपने बच्चे को इतना पिटा कि उसकी मौत हो गई. अब इसे क्या कहे. क्या कोई मां ऐसा कदम उठ सक्ती है. क्या कुरान ऐसा कही लिखा है जोर जबरदस्ती करो. उस बच्चे का क्या दोष था. वेल्स के शहर कार्डिफ में सारा एज नामक 33 वर्षीय महिला ने अपने बेटे यासीन एज को साल 2010 में मारने के बाद उसके शरीर को जला दिया था. पहले ये समझा गया कि यासीन की मौत घर में ही किसी वजह से हो गई होगी लेकिन जांच के बाद पता चला कि उसकी मौत काफी पहले हो गई थी और बाद में उसे जला दिया गया था. इससे इस्लाम कि तरफ देखने का नजरिया बदलता है. कोई भी धर्म या समाज ये कभी नही कहता के जोर जबरदस्ती से आगे जा सकता है. एक जिम्मेदारी निभाते हुए उसे पहले उस लायक बनाना था. जिसमे पहले उसे कुरान के बारे में बताना चाहिये था. लेकीन आज जिस तऱ्ह सभी जगह से गुस्से का इजहार किया गया उससे ये बात सबके समझ में आयी है. हमें जो चिज अच्छी लगती है जरूरी नही के वो अपने बच्चो को भी अच्छी लगे. अपने बच्चो को समझे उनकी भावना का सम्मान करे .

सोमवार, 30 अप्रैल 2012

पत्थर की लकीरें

ये कहानी एक ऐसे होनहार लड़के की जिसने पत्थर को ही नहीं बल्कि जिन्दगी को एक जीता जागता चित्र बनाया.  ये जिन्दगी भी कितनी अजीब होती हैं.  कब क्या होगा किसीको पता नहीं चलता. एक छोटेसे गाँव में पत्थर तोड़नेवाले समाज में पैदा हुए इस  आंतरराष्ट्रीय कलाकार की ये कहानी हैं. माँ बाप गरीबी से झुझते हुए रोजमर्रा की जीवन में संघर्ष करते हैं. ऐसे परिवार में एक लड़का बड़ा होता हैं अपने प्रतिभासे अपना नाम रोशन करता हैं. ऐसे ही एक प्रतिभाशाली और होनहार चित्रकार की ये कहानी हैं.
महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के मोहोल तहसील में शिरापुर नाम का एक गाँव. छोटासा क़स्बा जहाँ पे शशिकांत धोत्रे का जनम हुआ. बचपन से गरीबी के मार से झुझते हुए बड़ा होता शशिकांत एक सपना संजोये हुए था. उसे चित्रकारी से लगाव था. लेकिन गरीबी के मारे वो आगे नहीं जा सकता था. ऐसे में उसने १० वी तक लगभग पढलिख लिया. उसके बाद उसे दुसरे लड़कों की तरह काम  की तलाश के लिए निकलना पड़ा. गाँव के पास नदी से रेती निकलने वाले ट्रक पर वो मजदुर की हैसियत से जाने लगा. लेकिन उसे अपना मूल आधार चित्रकला गंवाना नहीं थी. ऐसे में उसने एक चित्र तैयार करके दिखाया. तो उसके दोस्तों से उसे चित्रकला की प्राथमिक शिक्षा लेने की सलाह दी. उसने वो भी किया. लेकिन उसे पैसे नहीं मिले.
उसके बाद १२ तक की पढाई की. वो मुंबई चला गया. वहां  कुछ छोटे मोटे कम करना शुरू किया. फिर भी उसे कुछ अलग करना था.  एक स्पर्धा के लिए अपना चित्र भेजा जिसे प्रथम पारितोषिक मिला. शशिकांत का हौसला बढ़ा. कुछ ने उसे जे. जे. आर्ट कॉलेज में जाने की सलाह दी. लेकिन उसके पास इतने पैसे नहीं थे. वहां जाकर भी उसे वापस आना पड़ा.  वो कॉलेज छोड़ना पड़ा. फिर पहले की तरह वो बेकार सा  घूमता रहा.
फिर शशिकांत ने पोस्टर्स तैयार करना शुरू किया  इन, आउट, एक्सिट के बोर्ड लिखकर उसने अपनी  जिन्दगी गुजारना शुरू की.  उसकी पहली पेंटिंग्स ३००० रुपयों में बिकी. उसके बाद उसने पीछे मूड कर नहीं देखा.
कुछ दिन पहले उसकी जहाँगीर आर्ट ग्यालरी में प्रदर्शनी भरी हुई थी. मुंबई के सभी कलाकार आये. सभी ने उसके पेंटिंग्स को सराहा. अमेजिंग, हो ही नहीं सकता, ये कैसा अजब का चित्रकार हैं. सभी का एक ही कहना था. कितना अजब का चित्रकार हैं. काले कागज पे पेंटिंग करता हैं. ऐसा कभी हुआ भी हैं?
आज शशिकांत की पेंटिंग्स टाटा, अम्बानी से लेकर ऊँचे लोगों तक खरीद चुके हैं. आज लन्दन के आर्ट मैगजीन में  उसके बारे में छपा हैं. लेकिन फिर भी उसके पाँव अभी भी मिटटी के ही हैं.
वो आज भी अपने पैतृक गाँव को नहीं भुला हैं. उसका परिवार उसके साथ ही रहता हैं. दुनिया के दूर दूर के लोग उसके साथ आना चाहते हैं. मिलना चाहते हैं लेकिन उसे वक्त नहीं हैं. आज भी गाँव के हर एक के साथ वो उसी अंदाज में पेश आता हैं.
अपने गाँव में उसने अपना स्टूडियो शुरू किया हैं. एम. एफ. हुसैन उसके आदर्श हैं. एक दिन उन्ही की तरह वो मशहूर होना चाहता हैं. आज भी उसे कई तरह के ऑफ़र्स आते हैं. लेकिन वो अपनी जिन्दगी खुद जीना चाहता हैं.

जिन्दगी का सफ़र हैं ये कैसा सफ़र
कोई समझा  नहीं कोई जाना नहीं.

रविवार, 29 अप्रैल 2012

हाथों की ठंडक

तेरे हाथों की लकिरें बताना भुल गयी 
मेरे साथ तेरा नाता पुराना हैं 
कुछ बाते कहने की नहीं 
समझने की भी होती हैं 

सरगर्मी की वो धुप 
और तेरे माथे का पसीना 
मुझे याद  दिलाता रहा 
फिसलते हुए क़दमों का बोझ.

पिछले साल की गर्मी मुझे 
बहुत कुछ ठंडक दिला गयी 
शायद तुम मेरे साथ थी 
और हाथों को  जकड के रक्खा था.

आज  सूरज की किरने
चुभते हुए काँटों की तरह लगती हैं 
शायद वो भी जानती हैं 
बहुत कुछ बदला हुआ हैं 

 आज भी याद करता हूँ 
जिन्दगी के वो हसीं पल 
डूबता हुआ सूरज भी 
माथे का सिंदूर बनकर बैठा है.


शनिवार, 28 अप्रैल 2012

भुले हुए रिश्तें

आज मैंने अपने सारे रिश्ते छोड़  दिए
जिस्म से उतारे हुए कपड़ों की तरह.

जब भी कभी उदास होता
और कुछ लिखता तो
वो बोलती इतना क्यों
नाराज होते हो, भुल जाओ

क्या मालूम था के
वो नाराजगी हमेशा के लिए थी
आज जब हम दोनों अलग हो गए हैं
तो वो सारी बाते याद आती हैं

जिन्दगी में कभी तन्हा न थे
लेकिन आज कुछ जरुर लगता हैं
उदासी का ये आलम कुछ
अपनासा  सा लगता हैं.

आज मैं उन बातों को
भुलाना चाहता हूँ
एक नयी जिन्दगी
फिरसे गुजारना चाहता हूँ.

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

आज कल पांव

आज कल पांव नहीं पड़ते मेरे, देखा हैं तुमने मुझे उड़ते  हुए. गुलजार साहब ने ये लिखा हुआ गीत बहुत ही सुन्दर हैं. आज कल हर एक को चलने  की  फुर्सत  ही नहीं हैं. सब लोग अपने अपने काम में इतने व्यस्त हैं के उन्हें विचार करने तक का समय नहीं मिलता. सभी लोग उड़ना चाहते हैं वो भी कम समय में. 
लोगों के चन्द मिनिटों में वो सुब कुछ चाहिए जिसे पाने के लिए कुछ घंटे लग सकते हैं. कोई रुकने के लिए बिलकुल ही तैयार नहीं. मालूम नहीं इस इंस्टंट ज़माने में लोग अपने आप को और कितना  खींचने  वाले हैं. हर एक बात की तय सीमा होती हैं. बच्चा भी अपने माँ की कोक से पैदा होने के लिए कम से कम 9 महीने  का समय लेता  हैं. लेकिन उसमे में भी कुछ जल्दी हो सकता हैं क्या इस बारे में संशोधन शुरू हुआ हैं.
इस इंस्टंट ज़माने में हर एक बात अलग हैं. बच्चों से लेकर बूढों तक सबको जल्दी हुई हैं. कम समय में पढाई करके जल्द  से जल्द  कोई नौकरी मिले. पैसे भी बहुत जल्दी मिले और एक कामयाब आदमी बनाने का सपना हर कोई संजोये हुए हैं. लेकिन एक बात जरुर हैं. समय से पहले और वक्त से ज्यादा किसीको कुछ नहीं मिलता. यही सबक सबने लिया तो वो बड़ा दिन होगा.

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

फेसबुक के आठ साल

करोडो लोग जिस नेटवर्क से जुड़े हैं वो फेसबुक आज आठ साल का होने जा रहा हैं.  ८४ करोड लोग इससे जुड़े हैं. फेसबुक के प्रमुख मार्क जुकेरबर्ग जिन्होंने इसकी शुरुआत की आज सबके चहेता बन गए हैं.  एडुँर्दो  सवेरिन, दुस्तीं मोस्कोवित्ज़,  ख्रिस हुगेस इन तिनोंके साथ उन्होंने एक ऐसा माध्यम सबके सामने लाया हैं, जो आज के विशेषतः युवाओं में खासा लोकप्रिय बना हुआ हैं.
ये बात कुछ और हैं के इसपर कुछ प्रतिबन्ध लगाये जाएँ ऐसा भारत सर्कार का कहना हैं. लेकिन फिर भी उसका कोई सानी नहीं हैं. गूगल प्लस ने अपनी वेब साईट शुरू की हैं. फिर भी उसपर कुछ असर नहीं पड़ा हैं. फेसबुक ने कई रिकोर्ड  कायम किये हैं. आज दुनिया का कोई ऐसा गाँव नहीं जहाँ पे कम से फेसबुक को नहीं जनता हो. इससे दुनिया के कई लोग जुड़े हैं. ये दुनिया अब गोल नहीं लगती. ये दुनिया अब फ्लैट हो गयी हैं. सब एक ही कतार में खड़े हैं ऐसा लग रहा हैं.
भारत में फेसबुक के तक़रीबन १३ करोड लोग यूज़र्स हैं. आज के हर युवोंका ये लोकप्रिय रहा हैं. पिछले दिनों एक सर्वे  हुआ जिसमे धीरे धीरे लोग फेसबुक से उकता गए हैं ऐसा कहा गया था . आखिर ये एक वेब साईट हैं कोई जीने के तरीका नहीं. हम इससे ज्यादा कुछ उम्मीद नहीं रखनी चाहिए.  जो लोग ऐसा करते हैं वो जरुर इससे बाहर जा सकते हैं.
यक़ीनन फेसबुक ने लोगों के जीने के अंदाज बदल दिए हैं. आज कोई भी कहीं भी जाये इससे जुड़ा रहना चाहता हैं. फेसबुक के इस आठ साल पुरे होने के अवसर पर इसे बधाई देना चाहिए और लोगों को करीब लाने के लिए धन्यवाद देना चाहिए.

फेसबुक के आठ साल

रविवार, 5 फ़रवरी 2012

युवी और हम

दो दिन पहले कैंसर डे मनाया गया और आज भारत के प्रतिभाशाली खब्बू खिलाडी युवराज सिंह को कैंसर होने की खबर मिली. सारा देश इस खबर से सकते में आया हैं. हालाकि ये डरनेवाली बात नहीं ऐसा  डोक्टोरोने कहा हैं लेकिन इससे ये जरुर जाहिर होता हैं के भारत ये पसंदीदा खिलाडी अब अगले कुछ दिन तक नहीं खेलने वाला.
कितने  अजीब होते  हैं ये  जिन्दगी के रिश्ते. कुछ दिन पहले युवी अच्छा नहीं खेल रहे तो तो उन्हें बाहर  बिठाने की बात कही जा रही थी. ये वोही युवी हैं जिन्होंने एक ही ओवर में ६ छक्के लगाये हैं और भारत को जितवाया हैं.
आज उनकी ये बीमारी की खबर सुनकर सबको बहुत बुरा लगा हैं और कईयों ने उनके ठीक होने की दुआ भी की हैं.
हर बीमार आदमी की तरफ देखने का दृष्टिकोण अलग होता हैं. दुश्मन भी न क्यों हो सब लोग उसके अच्छे होने के बारे में प्रार्थनाएं करते हैं. उसकी खुशहाली की दुआ मांगते हैं. आखिर ऐसा क्यों होता हैं. आदमी ऐसा क्यों करता हैं. कभी कभी पता ही नहीं चलता की ये वोही लोग हैं जो उसी व्यक्ति को गलियां दे रहे थे. यही एक सच्चा प्यार हैं जो आदमी को आदमी से जोड़ता हैं. ये एक अनमोल धागा हैं जो अपनों को नजदीक लाता हैं. 
युवी एक उदाहरण हैं समाज का, उसके अच्छे बुरेपन का. संस्कृति का. आदमी के  उसके मन में  अलग अलग भावनाएं पनपने  लगती हैं. लोग अपने भावनाओंको समझ नहीं पाते. ये एक ऐसी परिभाषा हैं जिसे हम एक सूत्र में नहीं बांध सकते.
आज कई ऐसे लोग हैं जो कैंसर जैसे रोगों से पीड़ित हैं. युवी के इस बीमारी के बाद हम सभी ऐसे लोगों के प्रति अच्छी भावनाओंके साथ अच्छा व्यवहार करे. उनके प्रति संवेदनाएं जताएं. आओं हम सभी लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करने की शपथ लें और उन्हें हमेशा खुश रखने की कोशिश करें.
 युवी और हम 

सोमवार, 30 मई 2011

कुछ अलग

बहुत दिनों के बाद लगा के ब्लॉग पे कुछ तो लिखूं। आये दिन कुछ खास नहीं रहा है। आयपीएल खत्म हुआ और लोग भूल भी गए की कुछ हुआ था। बाकि क्रिकेट अब बोअर होता जा रहा है हर दिन मैच देखी नहीं जाती। जैसे हर रोज अच्छा खाना कुछ फीका सा लगता हैं उसी तरह। बारिश हो रही हैं लेकिन उसमे भी अलग सा मजा नहीं आ रहा। कुछ लोग जरुर कहेंगे की हमें हर चीज़ में नयापन ढूँढना चाहिए। भ्रष्टाचार से लोग उकता गए हैं। अन्ना हजारे के अनशन को भी लोग भूल गए हैं। आदमी की सोचने की शक्ति अब कम होते जा रही हैं। इसीलिए लोग बहुत कम समय तक सोचते हैं और भूल जाते हैं।
नया कुछ अच्छा पढने को भी नहीं मिल रहा। लोगोंको वही वही पढ़कर बोअर होने लगा हैं। लोगों को इसीलिए कुछ चटपटा चाहिए। कुछ अलग। खेती और किसान के बारे में पढने को लोगों को इंतना मजा नहीं आता। हाँ अगर प्याज और चीनी के दाम बढ़ गए तो लोग चिल्लाने लगते हैं। सब्जी, दाल और आटे के भाव बढ़ गए गए तो लोगों को लगता हैं किसान हमारी जेब पे डाका डाल रहे हैं। इसीलिए लोग किसान की आत्महत्या के बारे में भी पढना नहीं चाहते। ये भी दिन जायेंगे.

सोमवार, 14 मार्च 2011

दो व्यक्ति

कुछ लोग जिन्दगी में आते हैं और चले जाते हैं। लेकिन कुछ ऐसे होते हैं जो सही मायने में जिन्दगी को एक नया मोड़ देते हैं। उन्हें आगे बढ़ने में सहायता करते हैं। मैं आज दो लोगों की बात करूँगा एक हैं अतुल पेठे और दुसरी हैं अंजलि गुर्जर। पिछले दिनों नाशिक में एक वोर्क्शोप हुआ। जहाँ पे में काम करता हूँ उस लोकमत द्वारा। पहले ही दिन मुझे एक ऐसे शख्स मिले जो मुझसे भी उम्र में बड़े होकर चुस्तिले और फुर्तीले थे। बकाये तौर पे वो काफी नौजवान हैं। ऐसा शख्स मैंने पहले कभी नहीं देखा। इतना की आदमी की प्रतिभा इतनी ज्यादा हो सकती हैं मैंने पहली बार देखा। आपने आप में झाँकने को उन्हों ने सिखाया। मैं भी कई बार दंग रह गया की क्या मुझमे वाकई ऐसा कुछ हैं जिसके तरफ मैं अच्छे नजर से देख सकता हूँ। क्या क्या नहीं सिखाया उन्होंने। चित्रकला, संगीत, नृत्य, नाटक और भी बहुत कुछ। अपने मन के अन्दर की चौथी खिड़की खोलने को उन्होंने सिखाया।
इस भाग दौड़ भरी जिन्दगी से कुछ निज़ात पाने के लिए ये वर्क शॉप जरुरी था। लेकिन जिस प्रकार से अतुल पेठेजी ने हमें सिखाया वो किताब के बाहर भी एक जिन्दगी हैं। उसके तरफ किस नजर से देखे वो पढने जैसा था। हम पत्रकार के अलावा भी कुछ हैं एक इंसान उसीका अंदाज़ा उन्होंने दिखाया। मैं उनकी कला की क़द्र करता हूँ और उन्हें नमन करता हूँ।
एक और हस्ती से मैं मिला उनका नाम था अंजलि गुर्जर। वैसे उनकी मुलाकात एक बस में हुई। मैं रिच डैड एंड पुअर डैड किताब पढ़ रहा था। वो मेरे पास पास वाले सिट पे बैठी थी। कुछ देर बाद उन्होंने पुचा इस किताब में क्या हैं। उसके बाद उन्होंने जो उनके बारे में बताया वो अजब था। एक महिला जो नया सोचती हैं वो सुनके मैं दंग रह गया। क्या क्या नहीं किया उन्हों ने। ट्रेकिंग, राफ्टिंग सभी किया। उनकी और भी बड़ी इच्छा हैं। काश मैं उनकी तरह कुछ कर पाता। मुझे उन्होंने कुछ बताया, या सिखाया मैं जिन्दगी भर नहीं भूल पाऊंगा। बहुत ही उम्दा महिला और बहुत आशादायी महिला। उन्होंने बहुत सारे जगह पे जाके उसका अभ्यास किया हैं। और बार बार जाने की इच्छा भी हैं उनकी। मै काफी खुश हूँ उनसे मिलके और आशा करता हूँ के आगे भी मिलु और उनसे और ज्ञान प्राप्त करू। मैं उनको प्रणाम करता हूँ.

गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

गुजरे हुए पलों को कौन लौटा सकता है, आने वाले फिजाओं की रंगत कौन पहचाने, आओ दुआ करे उगते हुए सूरज से, भर दो झोली उन नंगे फकीरों की, आओ फिर से एक हो जाएँ, देश के लिए मिट जाएँ। नए साल की खुशियां मनाते समय उन सभी को याद करे। छोटा हो या बड़ा, आमिर हो या गरीब सबकी खुशियाँ आबाद रहे, दिल हमारा अजीम रहे। सभी को नया साल मुबारक।