गुरुवार, 4 नवंबर 2010

बचपन

बचपन के वो दिन याद आते है,
जब संग खेले थे अपने साथियों के साथ,
बहुत शोर मचाया था और डांट भी खायी थी.

गिल्ली, डंडा लेके जब गांव के बाहर,
आम के पेड़ के निचे बैठ के खाए थे,
माँ ने दि हुयी रोटी और बेसन,
जब भी वो देखता हूँ तो माँ की याद आती है.

वीरानसी पड़ी हुई हवेली,
भुत प्रेत की वो अजब कहानियां,
डरावनी लगती थी वो सड़कें,
जब गुजरते थे हम उस तरफसे.

गुड, बेर, मुली, गाजर क्या नहीं था लाया,
जमींदार के खेत से चुपके से जाकर,
आज भी वो सब याद आता हैं,
मानो शहर एक जमींदार सा लगता है.

गांव के पास से बहती हुई नदी,
झरनों से गुन गुन करती कोयल,
कितना सुहावना था मौसम,
आँगन भी लगता था श्याम जी का गोकुल.

आज अपने घर के बाहर जब मै देखता हूँ
बचपन के वो सारा मंजर नजर आते है,
दिवाली की वो रात मेरा गांव कितना जगमगाता था,
हाँ कुछ जरुर शान कम हुई हैं लेकिन आनंद वही हैं.

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

जश्न

अँधेरे में वो जगमगाता शहर मुझे अजीब सा लगता है,
फटे पुराने कपड़ों में लपेटा हुआ नया दुपट्टा सा लगता है.

सारे शहर में जिस तरह रात भर जश्न चल रहा है,
लगता तो ऐसा है के सारे तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ है,
क्या वास्तविकता से परे होकर हम जी रहें है,
क्या आज भी सभी तरफ उजियारा है?

नए दीप जलाते तो है, लेकिन मन का अँधियारा नहीं मिट पाया,
जगमगाते हुए शहरों का सुनापन अब भी उसी तरह है,
कितने घर अब भी चिराग के लिए सुलग रहें है,
ना जाने कितनों के तन अब भी ठन्डे पड़े हैं.

खुशियाँ की सौगात तो आई है, लेकिन जरा उधर भी देखो,
उन अनगिनत विवस्त्र पड़े हुए बच्चों की तरफ,
जो बिना माँ बाप के रेल की पटरी को अपना घर समझते है,
उनकी भी खुशियाँ बाटों फिर देखो सही मायने में जिन्दगी.

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

मकान

देखो महलों में रहनेवालों
हमारे तरफ भी जरा एक नजर उठाके देख लो
रहते हो तुम उस जहाँ में,
हमारे लिए भी कोई आसरा तो दो.

घर का मतलब ही क्या हैं हमारे लिए,
चार दिवारों के ऊपर एक टुटी फुटी छत,
बारिश के समय में होगा एक आसरा,
लगी ठण्ड तो होगा नंगे बदन को ढकने का सहारा.

आप के लिए घर पैसे जमा करने एक व्यापार हैं,
मिला तो सही नहीं मिला तो कई कारोबार हैं,
हमारे लिए वो जिन्दगी भर की पूँजी हैं,
पल पल मरकर जिने के लिए बनाया ताजमहल.

दर दर की ठोकरे खाकर,
हमने बनाया हैं आशियाँ,
हम ही जानते हैं घर का मतलब क्या हैं,
आप के लिए कुछ होगा हमारे लिए तो मंदिर है.

आज भी कईयों के सपने,
सच नहीं होते,
कई बार तो लगता हैं जिते ही हैं,
एक मकान के लिए.

कई करोड़ों के लिए ये,
आज भी एक सुहाना सपना है,
हर एक को लगता हैं,
हो न हो मकान अपना हैं.

कहते हैं मकान उजड़ी हुयी दुनिया बसाता हैं,
दुनिया एक घर नहीं तो और क्या हैं,
फिर भी लोग आज एक मकान के लिए दरबदर भटकते हैं,
मारे मारे दो गज जमीं के लिए अपना सर पटकते है.

सुबह

सुबह होती है और शुरुआत होती है,
जिंदगी के नये सफ़र की.

भोर की पहली किरण निकलते ही ,
वो मंदिरों से आती हुई शहनाई की आवाजें,
मस्जिदों से आती हुई अजान की पुकार,
नदी के किनारे स्नान करते हुए लोगों की प्रार्थनाएं.

बच्चों की स्कूल के लिए चल रही तय्यारी,
दूधवाला और पेपरवाला भी दौड़ रहे है,
हर को पहुंचना है सही समय पे,
किसको समय है दुसरे की तरफ देखने के लिए.

सुबह का उगता हुआ सूरज,
सबको सिखाता हैं जिने का अंदाज़,
कल क्या हुआ ये न सोचो,
आज क्या होगा इसके लिए तैयार रहो.

दिन ढलने से आई हुई थकान,
सुबह के ठंडी हवाओं की ताजगी,
देती हैं उर्जा फिरसे कम करने की,
ये सुबह बार बार देती हैं जनम.

हर सुबह नयी लगती है,
बिलकुल दुल्हन की तरह,
व्याकुल अपने हमसफ़र को मिलने को,
और नए घर को फिरसे सँवारने को.

सुबह आये तो महक उठे समां,
फुल खिल उठे और कोयल चहकने लगे,
वो सुनसान सा जंगल भी,
किसी शादी के मंडुए की तरह लगे.

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

रिश्तें

कुछ रिश्तों को गन्दी नजरों से देखा जाता हैं,
क्या वो कानून अब भी अँधा बना हुआ हैं?

जात पात से परे होकर हम आगे तो जा रहें हैं,
लेकिन अभी भी मा बहनों को देखने का नजरिया वही हैं,
क्यों उनके दर्द हम पहचान नहीं पाते हैं?,
क्यों उनकी भावना हम समझ नहीं पाते हैं?

क्या अभी भी वो एक खिलौना हैं,
हमारी जिन्दगी को खुश रखने का?
क्या उन्हें अपना हक़ दिलाने में,
हमारी असल में कसौटी हैं?

सच तो ये हैं के हम ही उनके रास्ते के कांटे हैं,
हम खुद नहीं चाहते के वो आगे आयें,
हम भी वही सामंतवादी प्रतिष्ठा के रक्षक हैं,
जो खुद नहीं चाहते कोई भी हमसे आगे जाएँ.

जब तक हम उन्हें अपना अधिकार नहीं बाटेंगे,
हम उन्हें सही मायने में अपना हमसफ़र नहीं बनायेंगे,
हमें कोई अधिकार नहीं उन्हें गूंगी गुड़ियाँ बनाने का,
उन्हें पल पल यातना दिलाने का.

सोचा था ये पुरुष प्रजाति नहीं देगी ,
तो कानून तो दिलाएगा उन्हें अधिकार,
अपने आँखों पे लगी काली पट्टी उसने हटाई नहीं हैं,
कानून भी पुरुषों ने ही बनाया होगा?

गंदे शब्द कितनी भी कहें होंगे,
काले धब्बे कितने ही लगाने की कोशिश की होगी,
वो आज भी गंगा की तरह पवित्र हैं,
जरुरत हैं उसका जल ऐसे विकृतियों को पिलाने का.

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

भविष्य

क्या होगा भविष्य उन शहरों का,
जो भरे पड़े हैं लोगों के जंगलों से.

सुन्दर पर्वत अब उजड़ी हुयी मांगों की तरह दिखते हैं,
कईं लोग कांप रहें हैं उनकी जड़े बेखौफ होकर.

गन्दी नालियां, गंदे रास्ते अब बन गए हैं कूड़े,
झुग्गियों से निजात कब मिलेगी यही सोच रहें हैं कीड़े.

पानी के लिए अब भी लोग तरस रहें हैं ,
एक एक बूंद के लोग एक दुसरे पे बरस रहें हैं.

आज भी लोग ठीक से सो नहीं पाते.
डर के मारे मकान से निकल नहीं पाते.

सोने के लिए बिस्तर भी कम पड़ता हैं,
खाने के लिए अनाज भी कम पड़ता हैं.

उनकी फरियाद सुनने वाला कोई नहीं हैं,
जाये तो कहाँ जाएँ बताने वाला कोई नहीं हैं.

ऊपर वाला भी आजकल सुनता हैं उनकी ही जो मोटा चढ़ावा चढाते हैं.
गरीबों की सुनने के लिए उसके पास वक्त नहीं हैं, वो कहाँ भाव बढ़ाते हैं.

पानी से भी सस्ता दूध ,किसान कहाँ बोते हैं,
माँ के बिना बच्चे भी लोरी सिवा सोते हैं.

नेता, गुंडों की सब मिली जुली हैं,
ज़माने की आगे किसकी चली हैं.

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

अधूरापन

जब भी चाँद को देखते हैं,
अधूरापन नजर आता हैं हमें.

लावारिस सी भटक रही जिन्दगी,
खाली हाथ कटोरा लेके घूमते भिखारी,
और सुनसान सी गली में बंद पड़ा कमरा,
सभी एक जैसे दिखते हैं.
ऊजड़े गाँव, बंजर खेत,
बीमार माँ बाप और पापी पेट,
किसको सुनाये अपना हाल,
रोटी के लिए फिरता मायाजाल.

क्या आदमी आपने आप को पहचान पायेगा,
इन सारी खोखलेपन से निजात पायेगा,
फटे हुए छतों से अब बेबस चाँद नजर आता हैं,
झडे हुए पत्तों से शजर अधुरा सा नजर आता हैं.